भारत सरकार द्वारा सोना और चांदी के आयात पर मूल सीमा शुल्क और कृषि अवसंरचना एवं विकास उपकर बढ़ाने का निर्णय इन दिनों व्यापक चर्चा का विषय बना हुआ है।
नई व्यवस्था के तहत इन बहुमूल्य धातुओं के आयात पर कुल प्रभावी कर पंद्रह प्रतिशत तक पहुंच गया है। सरकार इसे विदेशी मुद्रा भंडार की सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए आवश्यक कदम बता रही है, जबकि उद्योग जगत इसे व्यापार और उपभोक्ताओं पर बढ़ते दबाव के रूप में देख रहा है।
ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या यह निर्णय केवल आर्थिक मजबूरी है या फिर व्यापक आर्थिक संतुलन साधने की रणनीति।
दरअसल मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों ने भारत सहित कई देशों की आर्थिक चिंताओं को बढ़ा दिया है।
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, अमेरिका-ईरान संबंधों में तल्खी और कच्चे तेल की कीमतों में संभावित उछाल ने आयात पर निर्भर देशों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है, इसलिए तेल कीमतों में वृद्धि का सीधा असर विदेशी मुद्रा भंडार, महंगाई और चालू खाते के घाटे पर पड़ता है।
ऐसे समय में सरकार स्वाभाविक रूप से विदेशी मुद्रा के उपयोग को प्राथमिकता के आधार पर नियंत्रित करना चाहती है।
कच्चा तेल, रक्षा सामग्री, उर्वरक, औद्योगिक कच्चा माल और आधुनिक तकनीक जैसे आयात देश की आर्थिक संरचना के लिए आवश्यक माने जाते हैं। इसके विपरीत सोना और चांदी मुख्य रूप से निवेश और उपभोग आधारित आयात हैं, जिन पर भारी विदेशी मुद्रा खर्च होती है।
भारत में सोने की मांग केवल परंपरागत कारणों तक सीमित नहीं रह गई है। आर्थिक अनिश्चितता के दौर में यह निवेश का सुरक्षित विकल्प बन चुका है।
शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव और वैश्विक संकटों के बीच निवेशकों का झुकाव लगातार बुलियन बाजार की ओर बढ़ा है।
यही कारण है कि स्वर्ण आधारित निवेश योजनाओं और गोल्ड ईटीएफ में भी रिकॉर्ड वृद्धि देखी गई है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नागरिकों से एक वर्ष तक सोने की खरीद टालने की अपील भी इसी व्यापक आर्थिक सोच का हिस्सा मानी जा रही है। यह केवल मितव्ययिता का संदेश नहीं, बल्कि विदेशी मुद्रा संरक्षण और गैर-जरूरी आयातों को सीमित करने की रणनीति है।
हालांकि सरकार के आर्थिक तर्क मजबूत दिखाई देते हैं, लेकिन इसके दुष्परिणामों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। शुल्क वृद्धि का पहला असर घरेलू बाजार में सोने और चांदी की कीमतों पर पड़ेगा। भारत जैसे देश में जहां विवाह, त्योहार और सामाजिक परंपराओं में सोने का विशेष महत्व है, वहां कीमतों में वृद्धि का सीधा प्रभाव मध्यम वर्ग और ग्रामीण उपभोक्ताओं पर पड़ना तय है।
इसके अलावा आभूषण उद्योग देश के सबसे बड़े रोजगार सृजन क्षेत्रों में से एक है। लाखों कारीगर, छोटे व्यापारी और निर्यातक इस उद्योग से जुड़े हैं। यदि मांग घटती है तो इसका असर रोजगार और व्यापार दोनों पर पड़ सकता है। उद्योग जगत पहले ही इस निर्णय को लेकर चिंता जता चुका है।
इस फैसले से जुड़ी सबसे बड़ी आशंका तस्करी को लेकर है। भारतीय आर्थिक इतिहास गवाह है कि जब-जब सोने पर अत्यधिक नियंत्रण और ऊंचे कर लगाए गए, तब-तब अवैध कारोबार को बढ़ावा मिला। 1960 और 1970 के दशक के स्वर्ण नियंत्रण कानूनों के दौरान समानांतर अर्थव्यवस्था का विस्तार इसका उदाहरण है। यदि घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कीमतों में अंतर बहुत अधिक बढ़ता है, तो तस्करी और अवैध आयात फिर सक्रिय हो सकते हैं।
सरकार के लिए चुनौती केवल आयात घटाने की नहीं, बल्कि संतुलन बनाए रखने की है। केवल शुल्क बढ़ाकर दीर्घकालिक समाधान संभव नहीं होगा। इसके साथ सरकार को स्वर्ण पुनर्चक्रण को बढ़ावा देना होगा, गोल्ड बॉन्ड योजनाओं को अधिक आकर्षक बनाना होगा और घरेलू बचत को उत्पादक निवेशों की ओर मोड़ने के लिए विश्वास पैदा करना होगा।
यह भी उल्लेखनीय है कि सरकार ने पहले परिस्थितियों के अनुकूल शुल्क कम भी किए थे। इससे स्पष्ट है कि मौजूदा निर्णय स्थायी नीति नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार उठाया गया कदम है। यदि भविष्य में तेल बाजार स्थिर होता है और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम होता है, तो शुल्कों में राहत संभव है।
वास्तव में आर्थिक प्रबंधन केवल कर बढ़ाने या आयात घटाने तक सीमित नहीं होता। यह विश्वास, संतुलन और दूरदर्शिता का विषय भी है। सरकार का यह कदम अल्पकाल में विदेशी मुद्रा संरक्षण और चालू खाते के घाटे को नियंत्रित करने में सहायक हो सकता है, लेकिन यदि इससे तस्करी बढ़ती है, घरेलू उद्योग प्रभावित होता है और उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है, तो इसके नकारात्मक परिणाम भी सामने आ सकते हैं।
इसलिए आवश्यक है कि सरकार आर्थिक स्थिरता और व्यापारिक हितों के बीच संतुलन बनाए रखे। क्योंकि किसी भी मजबूत अर्थव्यवस्था की पहचान केवल सख्त फैसलों से नहीं, बल्कि संतुलित और दूरदर्शी नीतियों से होती है।



