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ढलती उम्र की तन्हाई और बिखरता सामाजिक सुरक्षा तंत्र

ढलती उम्र की तन्हाई और बिखरता सामाजिक सुरक्षा तंत्र उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में विज्ञान ने जब औद्योगिक क्रांति को गति दी, तब इंसानी सभ्यता ने भौतिक समृद्धि का एक नया दौर देखा।

इसके बाद चिकित्सा विज्ञान के चमत्कारों ने मानव जीवन को दीर्घायु का वरदान दिया। महामारी और भुखमरी से बेमौत मरने वाली मानवता अब लंबी उम्र जीने लगी है। जीवन प्रत्याशा (लाइफ एक्सपेक्टेंसी) में हुई यह वृद्धि निश्चित रूप से मानव सभ्यता की एक बड़ी कामयाबी है, लेकिन इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में यही कामयाबी एक नए और अभूतपूर्व संकट के रूप में हमारे सामने खड़ी हो गई है।

वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर जनसांख्यिकीय संरचना (डेमोग्राफिक स्ट्रक्चर) में एक खामोश लेकिन गहरा बदलाव आ रहा है। आबादी का एक बड़ा हिस्सा अब धीरे-धीरे बुढ़ापे की दहलीज को पार कर रहा है। विडंबना यह है कि जिस गति से बुजुर्गों की आबादी बढ़ रही है, उतनी गति से हमारी सामाजिक, आर्थिक और ढांचागत व्यवस्थाएं उनके स्वागत के लिए तैयार नहीं हो पाई हैं।

नतीजतन, आधुनिक समाज में बुजुर्ग होना केवल शारीरिक शिथिलता का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह एक गहरा आर्थिक संकट, सामाजिक अलगाव और नैतिक पतन का पर्याय बनता जा रहा है। ढलती उम्र की यह तन्हाई और बिखरता हुआ सामाजिक सुरक्षा तंत्र आज के समय का वह ज्वलंत विमर्श है, जिस पर तुरंत और संजीदगी से विचार करने की आवश्यकता है।

इस संकट की गहराई को समझने के लिए सबसे पहले हमें बदलते हुए पारिवारिक और सामाजिक ताने-बाने को देखना होगा। सदियों से भारतीय समाज की रीढ़ रही संयुक्त परिवार प्रणाली (जॉइंट फैमिली सिस्टम) अब तेजी से इतिहास के पन्नों में सिमटती जा रही है।

महानगरीय संस्कृति, रोजगार की तलाश में बड़े पैमाने पर पलायन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की आधुनिक अवधारणा ने एकल परिवारों (न्यूक्लियर फैमिलीज) को जन्म दिया है। इस बदलाव का सबसे पहला और सीधा प्रहार परिवार के सबसे बुजुर्ग सदस्यों पर हुआ है।

जिस घर को उन्होंने अपनी पूरी जवानी और खून-पसीने से सींचा था, उसी घर के एक कोने में वे अक्सर अनचाहे मेहमान की तरह जीने को मजबूर हो जाते हैं। जब युवा पीढ़ी बेहतर अवसरों की तलाश में दूसरे शहरों या देशों का रुख करती है, तो पीछे छूट जाते हैं वे बूढ़े मां-बाप, जिनकी आंखों की रोशनी और पैरों की ताकत वक्त के साथ धुंधली पड़ चुकी होती है।

यह अलगाव केवल भौतिक नहीं होता, बल्कि यह एक गहरा भावनात्मक आघात होता है। दिन भर खाली पड़े कमरों की खामोशी और रात का सन्नाटा बुजुर्गों को मानसिक रूप से खोखला कर देता है।

सोशल मीडिया और आभासी दुनिया में व्यस्त रहने वाली नई पीढ़ी के पास अपने ही घर के बुजुर्गों के साथ बैठकर दो पल बात करने का समय नहीं है। संवाद का यह अभाव बुजुर्गों में अवसाद (डिप्रेशन) और अकेलेपन की मूक महामारी को जन्म दे रहा है, जो उनकी बची-खुची सेहत को भी लील लेती है।

पारिवारिक उपेक्षा के इस सामाजिक पहलू के समानांतर एक बेहद भयावह आर्थिक संकट भी काम कर रहा है। भारत जैसे विकासशील देश में, जहाँ आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र (अनऑर्गनाइज्ड सेक्टर) में काम करता है, बुढ़ापे के लिए वित्तीय सुरक्षा एक दिवास्वप्न जैसी है।

दिहाड़ी मजदूर, छोटे किसान, रेहड़ी-पटरी वाले और निजी क्षेत्र के छोटे कर्मचारियों के पास सेवानिवृत्ति (रिटायरमेंट) के बाद नियमित आय का कोई जरिया नहीं होता। देश की एक बड़ी बुजुर्ग आबादी आज भी किसी भी प्रकार की सरकारी या निजी पेंशन के दायरे से बाहर है।

जो सरकारी वृद्धावस्था पेंशन योजनाएं लागू हैं, उनकी राशि इतनी आंशिक है कि उसमें एक महीने की बुनियादी दवाइयाँ खरीदना भी मुमकिन नहीं है। ऐसी स्थिति में, आर्थिक आत्मनिर्भरता के अभाव में बुजुर्ग पूरी तरह से अपने बच्चों की मर्जी पर निर्भर हो जाते हैं। यह निर्भरता अक्सर उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाती है।

कई मामलों में तो संपत्ति और पैसे के लालच में बुजुर्गों के साथ घरेलू हिंसा और दुर्व्यवहार की घटनाएं भी सामने आती हैं। जब तक व्यक्ति कमाने योग्य रहता है, समाज और परिवार में उसकी उपयोगिता बनी रहती है, लेकिन जैसे ही वह अनुत्पादक (नॉन-प्रोडक्टिव) श्रेणी में आता है, उसे एक आर्थिक बोझ की तरह देखा जाने लगता है। आर्थिक असुरक्षा का यह माहौल बुढ़ापे को गरिमापूर्ण जीने के बजाय महज एक कशमकश बना देता है।

इसके साथ ही, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और बढ़ती चिकित्सा लागत ने इस संकट को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। उम्र बढ़ने के साथ शरीर का बीमारियों की चपेट में आना एक स्वाभाविक जैविक प्रक्रिया है। मधुमेह, हृदय रोग, अल्जाइमर और हड्डियों की कमजोरी जैसी बीमारियाँ बुढ़ापे के साथी बन जाती हैं। आधुनिक दौर में चिकित्सा व्यवस्था का जिस तेजी से व्यवसायीकरण हुआ है, उसने इलाज को आम आदमी की पहुंच से बाहर कर दिया है। भारत में स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाला जेब का खर्च दुनिया में सबसे अधिक है।

एक गंभीर बीमारी पूरे परिवार को कर्ज के जाल में धकेल सकती है। इस स्थिति में, स्वास्थ्य बीमा की नीतियां भी बुजुर्गों के अनुकूल नहीं हैं। अधिकांश निजी बीमा कंपनियां अधिक उम्र के लोगों को पॉलिसी देने में कतराती हैं या फिर उनका प्रीमियम इतना ऊंचा रखती हैं कि एक आम बुजुर्ग उसे वहन नहीं कर सकता। सरकारी अस्पतालों की लंबी कतारें, डॉक्टरों की कमी और बुनियादी सुविधाओं का अभाव बुजुर्गों के लिए बेहद कष्टकारी होता है।

चिकित्सा के अभाव में तड़पते और अपर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाओं के कारण असमय दम तोड़ते बुजुर्ग इस बात का प्रमाण हैं कि हमारा राज्य और समाज अपनी सबसे संवेदनशील आबादी को एक सुरक्षित और स्वस्थ जीवन देने में विफल रहा है। इस पूरे परिदृश्य का एक और गंभीर पहलू है, जो सीधे तौर पर कानून-व्यवस्था और सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। शहरों में अकेले रहने वाले बुजुर्ग अपराधियों के लिए बेहद आसान शिकार बनते जा रहे हैं।

आए दिन समाचार पत्रों में अकेले रह रहे वृद्ध दंपत्तियों की हत्या और लूटपाट की खबरें सुर्खियां बनती हैं। शारीरिक रूप से कमजोर होने के कारण वे अपनी रक्षा करने में सक्षम नहीं होते और समाज का सुरक्षा तंत्र भी उन्हें वह सुरक्षा कवच प्रदान नहीं कर पाता जिसकी उन्हें दरकार होती है। पुलिस प्रशासन के पास बुजुर्गों की निगरानी के लिए कागजी योजनाएं तो बहुत हैं, लेकिन धरातल पर उनकी प्रभावशीलता न के बराबर है। सुरक्षा की इस निरंतर चिंता के साए में जीना बुजुर्गों के मानसिक तनाव को और बढ़ा देता है।

वे अपने ही घरों में कैदियों की तरह रहने को मजबूर हो जाते हैं, जहाँ हर दस्तक उन्हें किसी अनहोनी के डर से भर देती है। यह केवल कानून और व्यवस्था की विफलता नहीं है, बल्कि यह हमारे उस सामाजिक ताने-बाने की विफलता है जहाँ पड़ोसी भी एक-दूसरे की सुध लेने से कतराते हैं।इस विकट समस्या का समाधान केवल लोक-लुभावन घोषणाओं या सहानुभूति की बैसाखियों से नहीं हो सकता। इसके लिए हमें अपनी आर्थिक और सामाजिक नीतियों में एक बुनियादी और क्रांतिकारी बदलाव लाना होगा। सबसे पहले, हमें ‘सिल्वर इकॉनमीÓ की अवधारणा को समझना और अपनाना होगा। दुनिया के कई विकसित देशों ने यह महसूस किया है कि बुजुर्ग आबादी को केवल एक जिम्मेदारी या बोझ मानने के बजाय उन्हें अर्थव्यवस्था के एक सक्रिय हिस्से के रूप में बदला जा सकता है।

बुजुर्गों के पास ज्ञान, अनुभव और कौशल का एक विशाल खजाना होता है, जिसका उपयोग समाज के निर्माण में किया जा सकता है। ऐसी आर्थिक नीतियां बनाने की जरूरत है जो बुजुर्गों के अनुकूल उत्पादों, सेवाओं और रोजगार के अवसरों को बढ़ावा दें। पार्ट-टाइम नौकरियां, परामर्शदाता (कंसलटेंट) के रूप में उनकी सेवाएं और सामुदायिक कार्यों में उनकी भागीदारी को संस्थागत रूप दिया जाना चाहिए। इससे न केवल वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनेंगे, बल्कि उनका खोया हुआ आत्मविश्वास और समाज में उनकी प्रासंगिकता भी वापस लौटेगी। इसके अलावा, हमारे यहाँ संचालित होने वाले सीनियर सिटीजन केयर होम्स (वृद्धाश्रमों) के पूरे ढांचे का आधुनिकीकरण करना अत्यंत आवश्यक है।

दुर्भाग्य से, भारतीय समाज में आज भी वृद्धाश्रम को एक अभिशाप या कलंक के रूप में देखा जाता है। हमें इस रूढ़िवादी सोच को बदलना होगा। केयर होम्स ऐसे स्थान नहीं होने चाहिए जहाँ बुजुर्गों को लाचारी में छोड़ दिया जाए, बल्कि वे ऐसे अत्याधुनिक केंद्र होने चाहिए जहाँ उन्हें सम्मान, उत्कृष्ट स्वास्थ्य सेवाएँ और एक जीवंत सामाजिक माहौल मिले। इन केंद्रों में मनोरंजन, योग, पुस्तकालय और सबसे महत्वपूर्ण बात, हमउम्र लोगों का साथ मिलना चाहिए, ताकि अकेलापन उनके जीवन पर हावी न हो सके। सरकार को निजी क्षेत्र और गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के साथ मिलकर सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल पर ऐसे आदर्श वृद्धाश्रमों का निर्माण करना चाहिए जो हर वर्ग के बुजुर्गों के लिए सुलभ और किफायती हों।

आर्थिक और ढांचागत सुधारों के साथ-साथ एक बेहद मजबूत और सार्वभौमिक मेडिकल इंश्योरेंस योजना की आवश्यकता है। आयुष्मान भारत जैसी सरकारी योजनाओं का दायरा बढ़ाकर देश के प्रत्येक वरिष्ठ नागरिक को बिना किसी शर्त और बिना किसी प्रीमियम के पूर्ण स्वास्थ्य सुरक्षा की गारंटी मिलनी चाहिए। बुजुर्गों के इलाज के लिए अस्पतालों में अलग से विशेष वार्ड (जेरियाट्रिक वार्ड) और विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति अनिवार्य की जानी चाहिए। इसके साथ ही, देश के पेंशन ढांचे को पूरी तरह से पुनर्गठित करने की जरूरत है। असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए एक ऐसी योगदान-आधारित सामाजिक सुरक्षा योजना होनी चाहिए जो उनके कामकाजी दिनों में छोटी-छोटी बचत को एकत्रित करे और बुढ़ापे में उन्हें एक सम्मानजनक मासिक पेंशन की गारंटी दे। राज्य का यह प्राथमिक कर्तव्य है कि वह अपने उन नागरिकों की ढलती उम्र को सुरक्षित करे जिन्होंने अपनी जवानी देश के निर्माण में लगा दी।अंतत:, यह पूरी बहस केवल सरकारी नीतियों, बजट और कानूनों तक सीमित नहीं रह सकती। यह मूल रूप से एक नैतिक और मानवीय प्रश्न है।

कोई भी कानून या सरकारी योजना तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक कि समाज की सोच में बदलाव न आए। हमें अपनी शिक्षा व्यवस्था और पारिवारिक मूल्यों में बुजुर्गों के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता के भाव को दोबारा स्थापित करना होगा। युवा पीढ़ी को यह समझना होगा कि बुढ़ापा कोई बीमारी या अपराध नहीं है, बल्कि यह जीवन का एक अनिवार्य और सुंदर पड़ाव है जिससे हर व्यक्ति को गुजरना है। आज हम बुजुर्गों के साथ जो व्यवहार कर रहे हैं, वही भविष्य में हमारे साथ भी हो सकता है। बुजुर्ग हमारी संस्कृति की जड़ें हैं, और जड़ों को सुखाकर कोई भी पेड़ हरा-भरा नहीं रह सकता। समय आ गया है कि राज्य, समाज और परिवार मिलकर अपनी जिम्मेदारियों को समझें और एक ऐसा सुरक्षित, संवेदनशील और समावेशी माहौल तैयार करें जहाँ ढलती उम्र तन्हाई का सबब न बने, बल्कि सम्मान और सुकून का उत्सव बन सके।

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