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आरक्षण और जातिगत जनगणना : 21वीं सदी के भारत में सामाजिक न्याय की नई दिशा

भारत में आरक्षण और जातिगत जनगणना का मुद्दा महज एक प्रशासनिक बहस नहीं है, बल्कि यह देश की सामाजिक, राजनीतिक और संवैधानिक संरचना की गहराई से जुड़ा एक भावनात्मक विषय है।

साल 2026 की दहलीज पर खड़ा भारत एक बार फिर खुद को उसी चौराहे पर पाता है, जहाँ वह तीन दशक पहले मंडल आयोग के दौर में खड़ा था। आज मांग केवल आरक्षण की नहीं है, बल्कि उस आरक्षण के आधार—यानी जातिगत जनगणना—की भी है।

भारत में आरक्षण की व्यवस्था ऐतिहासिक सामाजिक असमानता को दूर करने के लिए एक ‘सकारात्मक भेदभाव’ के रूप में लागू की गई थी। शुरुआत में यह अनुसूचित जाति और जनजाति तक सीमित था, लेकिन 1990 के दशक में मंडल आयोग की सिफारिशों के बाद अन्य पिछड़ा वर्ग को भी इसमें शामिल किया गया।

1992 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक ‘इंदिरा साहनी’ फैसले ने आरक्षण की सीमा 50% तय की। हालांकि, ‘असाधारण परिस्थितियों’ में इस सीमा को पार करने की गुंजाइश भी छोड़ी गई, जिसने आगे की बहसों का आधार तैयार किया।

आज भी ओबीसी और अन्य जातियों की सटीक जनसंख्या का आधिकारिक डेटा उपलब्ध नहीं है। 1931 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर ही मंडल आयोग ने अनुमान लगाया था। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि बिना ठोस डेटा के सामाजिक न्याय की नीति कितनी प्रभावी हो सकती है।

‘जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उसकी उतनी भागीदारी’—यह नारा आज राजनीतिक विमर्श के केंद्र में है। समर्थकों का तर्क है कि सटीक आंकड़ों के बिना नीतियां केवल अनुमान पर आधारित रहती हैं। बिहार के जातिगत सर्वे ने इस बहस को नई गति दी है।

समर्थकों का कहना है कि बदलती जनसांख्यिकी और सामाजिक आकांक्षाओं के चलते 50% की सीमा अब प्रासंगिक नहीं रही। ईडब्ल्यूएस आरक्षण के बाद प्रभावी आरक्षण 60% तक पहुंच चुका है, जिससे यह तर्क और मजबूत होता है।

वहीं आलोचक इसे ‘मेरिट’ के खिलाफ मानते हैं। उनका तर्क है कि लगातार बढ़ता आरक्षण सामाजिक विभाजन को और गहरा कर सकता है।

बिहार द्वारा आरक्षण सीमा 75% तक बढ़ाने का कदम यह दर्शाता है कि राजनीति अब ‘समानता’ से आगे बढ़कर ‘समानुपातिक प्रतिनिधित्व’ की ओर बढ़ रही है। लेकिन इसके साथ यह खतरा भी जुड़ा है कि राजनीति पूरी तरह जातिगत समीकरणों में उलझ सकती है।

यह बहस केवल नीतिगत नहीं, बल्कि नैतिक भी है। क्या ‘मेरिट’ वास्तव में समान अवसरों के बिना संभव है? यदि समाज का एक बड़ा हिस्सा शिक्षा और संसाधनों से वंचित है, तो प्रतिस्पर्धा कितनी न्यायसंगत है?

निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग इस बहस को और जटिल बनाती है। जहां एक ओर इसे सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में देखा जाता है, वहीं उद्योग जगत इसे प्रतिस्पर्धा के लिए खतरा मानता है।

आने वाले समय में सुप्रीम कोर्ट और सरकार दोनों की भूमिका निर्णायक होगी। 2026 का परिसीमन और जातिगत जनगणना का मुद्दा मिलकर भारतीय राजनीति की दिशा बदल सकते हैं।

अंततः, आरक्षण और जातिगत जनगणना का उद्देश्य समाज को बांटना नहीं, बल्कि सशक्त बनाना होना चाहिए। केवल कोटा बढ़ाने से समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसरों का विस्तार आवश्यक है।

भारत को एक ऐसे मॉडल की जरूरत है, जहाँ ‘जाति’ पहचान तो हो, लेकिन प्रगति की बाधा न बने। यही 21वीं सदी के ‘विकसित भारत’ की असली परीक्षा होगी।

(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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