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क्या हमारी शिक्षा प्रणाली रोजगार देने में सक्षम है? डिग्री बनाम कौशल की सच्चाई

शिक्षा प्रणाली हमारे सामने एक ऐसी युवा शक्ति की तस्वीर उभरती है जो डिग्रियों से लदी हुई है, लेकिन रोजगार के बाजार में खड़ी होकर अपनी जगह तलाश रही है। हर साल भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों से लाखों की संख्या में स्नातक और परास्नातक छात्र अपनी डिग्री लेकर निकलते हैं।

दीक्षांत समारोहों में टोपियां उछाली जाती हैं, सुनहरे भविष्य के सपने बुने जाते हैं, लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि इन डिग्रियों का बड़ा हिस्सा कॉर्पोरेट जगत और आधुनिक इंडस्ट्री की जरूरतों के सामने बौना साबित होता है।

हम एक ऐसे संकट के मुहाने पर खड़े हैं जहाँ ‘बेरोजगारी’ से बड़ी समस्या ‘अकुशलता’ बन गई है। डिग्री और हुनर के बीच बढ़ती यह खाई न केवल हमारे युवाओं के भविष्य को अंधकारमय बना रही है, बल्कि देश की आर्थिक प्रगति की गति को भी बाधित कर रही है।

सवाल यह है कि क्या हमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली वास्तव में रोजगार देने में सक्षम है, या यह केवल कागजी प्रमाणपत्र बांटने वाली एक फैक्ट्री बनकर रह गई है? शिक्षा प्रणाली का वर्तमान ढांचा और सैद्धांतिक बोझहमारी वर्तमान शिक्षा प्रणाली की सबसे बड़ी विफलता इसका अत्यधिक सैद्धांतिक होना है।

लॉर्ड मैकाले द्वारा स्थापित जिस शिक्षा पद्धति को हम आज भी ढो रहे हैं, उसका मूल उद्देश्य क्लर्क पैदा करना था, न कि अन्वेषक या कुशल कारीगर। आज भी हमारे स्कूलों और कॉलेजों में उसी घिसे-पिटे पाठ्यक्रम को पढ़ाया जा रहा है, जिसका वर्तमान उद्योग की बदलती तकनीक से कोई लेना-देना नहीं है।

एक इंजीनियर चार साल तक किताबों में वही पुरानी मशीनें पढ़ता है जो इंडस्ट्री से दशकों पहले बाहर हो चुकी हैं। परिणाम स्वरूप, जब वह छात्र नौकरी के लिए इंटरव्यू देने जाता है, तो उसे पता चलता है कि उसके पास जो ज्ञान है, वह केवल पन्नों तक सीमित है और वास्तविक कार्यस्थल पर उसकी कोई उपयोगिता नहीं है।

यह सैद्धांतिक बोझ छात्रों के मानसिक विकास को तो रोकता ही है, साथ ही उन्हें आत्मविश्वास से भी वंचित कर देता है।

रचनात्मकता का अंत ‘रटंत विद्या, घटंत बुद्धि’— यह कहावत आज की शिक्षा प्रणाली पर सटीक बैठती है। हमारी परीक्षा प्रणाली इस तरह से डिजाइन की गई है कि वह केवल छात्र की याददाश्त की जांच करती है, उसकी समझ या विश्लेषणात्मक क्षमता की नहीं।

छात्र साल भर केवल इस बात की तैयारी करते हैं कि परीक्षा में पूछे गए सवालों के जवाब कैसे रटकर लिखे जाएं ताकि उन्हें अधिक अंक मिल सकें। इस अंक-दौड़ ने छात्रों के भीतर की रचनात्मकता और जिज्ञासा को पूरी तरह खत्म कर दिया है। जब कोई छात्र केवल पास होने के लिए पढ़ता है, तो वह ‘सीखने’ की प्रक्रिया को भूल जाता है। रचनात्मकता के बिना कोई भी छात्र नया आविष्कार या समस्या का समाधान नहीं निकाल सकता। इंडस्ट्री को आज ऐसे लोगों की जरूरत है जो संकट के समय ‘आउट ऑफ द बॉक्स’ सोच सकें, लेकिन हमारी शिक्षा प्रणाली उन्हें ‘इन द बॉक्स’ रहने का प्रशिक्षण दे रही है।

सर्टिफिकेट बनाम वास्तविक ज्ञान: एक मिथ्या धारणासमाज में यह धारणा घर कर गई है कि केवल एक उच्च डिग्री या सर्टिफिकेट ही सफलता की गारंटी है। इसी दबाव में छात्र ऐसी डिग्रियां हासिल करने में लग जाते हैं जिनमें उनकी कोई रुचि नहीं होती। बाजार में आज डिग्रियां बेची और खरीदी भी जा रही हैं, लेकिन ज्ञान का कोई शॉर्टकट नहीं होता। एक छात्र जिसके पास गोल्ड मेडल है, लेकिन वह कंप्यूटर पर एक साधारण एक्सेल शीट या कोडिंग का बुनियादी काम नहीं कर सकता, उसकी डिग्री की वैल्यू शून्य है। तकनीकी ज्ञान के बिना सिर्फ सर्टिफिकेट का बोझ उठाना वैसा ही है जैसे बिना पानी के लोटा हाथ में रखना। आज की ग्लोबल इकोनॉमी में ‘सर्टिफिकेट’ केवल एंट्री गेट तक ले जा सकता है, लेकिन गेट के अंदर टिके रहने के लिए ‘हुनर’ की ही जरूरत होती है। जब तक छात्र और अभिभावक इस सच को स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक डिग्री की रद्दी बढ़ती रहेगी।

रोजगार न मिलने का एक प्रमुख कारण शैक्षणिक संस्थानों और औद्योगिक इकाइयों के बीच तालमेल का अभाव है। विकसित देशों में इंडस्ट्री यह तय करती है कि छात्रों को क्या पढ़ाया जाना चाहिए, ताकि उन्हें तैयार वर्कफोर्स मिल सके। भारत में इसके विपरीत, सिलेबस और इंडस्ट्री की मांग के बीच कोई सीधा संवाद नहीं है। आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा साइंस और मशीन लर्निंग का दौर है, लेकिन कई विश्वविद्यालयों में अभी भी बुनियादी कंप्यूटर शिक्षा भी ढंग से नहीं दी जा रही। जब तक पाठ्यक्रम को इंडस्ट्री की तात्कालिक और भविष्य की जरूरतों के अनुसार अपडेट नहीं किया जाएगा, तब तक डिग्री धारक छात्र बेरोजगारी की कतार में ही खड़े रहेंगे।

हमारे देश में व्यावसायिक शिक्षा को हमेशा दोयम दर्जे का माना गया है। यदि कोई छात्र प्लंबिंग, इलेक्ट्रिशियन, कारपेंट्री या ऑटोमोबाइल रिपेयरिंग का कोर्स करता है, तो उसे समाज में वह सम्मान नहीं मिलता जो एक बी.टेक या एम.बी.ए. छात्र को मिलता है। यही सामाजिक रूढ़िवादिता हमारे युवाओं को हुनर सीखने से रोकती है। हमें यह समझना होगा कि हर कोई मैनेजर नहीं बन सकता; देश को कुशल तकनीशियनों की भी उतनी ही जरूरत है। विकसित देशों जैसे जर्मनी या जापान में व्यावसायिक शिक्षा को मुख्यधारा की शिक्षा के बराबर महत्व दिया जाता है, यही कारण है कि वहां बेरोजगारी दर बहुत कम है। जब तक हम ‘काम’ को छोटा या बड़ा समझना बंद नहीं करेंगे, तब तक कौशल विकास की राह कठिन रहेगी।

विज्ञान हो या वाणिज्य, बिना व्यावहारिक अनुभव के शिक्षा अधूरी है। हमारे अधिकांश शिक्षण संस्थानों में प्रयोगशालाएं या तो हैं ही नहीं, और अगर हैं तो वहां धूल जम रही है। छात्रों को इंटर्नशिप के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता।

बंद कमरों में ब्लैकबोर्ड और चॉक से पढ़कर कोई छात्र सेल्समैन, इंजीनियर या डॉक्टर नहीं बन सकता। जब छात्र जमीन पर उतरकर काम करता है, तो उसे वास्तविक चुनौतियों का पता चलता है। प्रैक्टिकल ट्रेनिंग न केवल कौशल सिखाती है, बल्कि कार्यस्थल पर टीम के साथ काम करने, समय प्रबंधन और संचार कौशल जैसे ‘सॉफ्ट स्किल्स’ भी विकसित करती है, जो आज की कॉर्पोरेट दुनिया में अनिवार्य हैं।

सरकार ने नई शिक्षा नीति के माध्यम से इस समस्या को जड़ से खत्म करने की कोशिश की है। छठी कक्षा से ही व्यावसायिक कोर्स और कोडिंग शुरू करने का प्रस्ताव एक क्रांतिकारी कदम है। इसमें ‘मल्टीपल एंट्री और एग्जिट’ का विकल्प दिया गया है, जिससे छात्र अपनी परिस्थिति के अनुसार पढ़ाई और कौशल प्रशिक्षण के बीच संतुलन बना सकते हैं।

यह नीति डिग्री के बजाय ‘क्रेडिट’ और ‘स्किल’ पर जोर देती है। यदि इसे सही तरीके से लागू किया जाता है, तो आने वाले समय में हमें डिग्री के साथ-साथ हुनरमंद युवा भी मिलेंगे। हालांकि, चुनौती इसके क्रियान्वयन की है, जिसके लिए बुनियादी ढांचे और शिक्षकों के प्रशिक्षण की आवश्यकता है।

शिक्षा प्रणाली को रोजगारपरक बनाने के लिए कुछ कड़े और प्रभावी कदम उठाने होंगे। सबसे पहले, पाठ्यक्रम में ‘व्यावहारिक शिक्षा’ का हिस्सा कम से कम 50 प्रतिशत करना अनिवार्य होना चाहिए। डिग्री के प्रत्येक वर्ष में अनिवार्य इंटर्नशिप और प्रोजेक्ट वर्क को जोड़ना चाहिए। दूसरा, ‘स्किल इंडिया’ जैसे अभियानों को केवल कागजों से निकालकर ग्रामीण क्षेत्रों के अंतिम छात्र तक पहुँचाना होगा। तीसरा, उच्च शिक्षा संस्थानों को उद्योगों के साथ एम.ओ.यू. साइन करना चाहिए ताकि छात्र पढ़ाई के दौरान ही कंपनियों की कार्यशैली से परिचित हो सकें। चौथा, हमें उद्यमिता को बढ़ावा देना होगा ताकि युवा केवल ‘नौकरी मांगने वाले’ न बनें, बल्कि ‘नौकरी देने वाले’ बनें।

डिग्री और तकनीकी हुनर के अलावा, एक और महत्वपूर्ण पहलू है—सॉफ्ट स्किल्स। आज की प्रतिस्पर्धी दुनिया में केवल काम आना काफी नहीं है, बल्कि अपनी बात को प्रभावी ढंग से रखना, नेतृत्व करना और निरंतर सीखते रहने की ललक भी उतनी ही जरूरी है। हमारी शिक्षा प्रणाली में जीवन कौशलों को कोई स्थान नहीं दिया गया है। छात्रों को यह नहीं सिखाया जाता कि असफलता को कैसे संभालें या टीम वर्क कैसे करें। रोजगार केवल काम करने की क्षमता नहीं है, बल्कि यह एक संपूर्ण व्यक्तित्व का प्रदर्शन है। इसलिए, व्यक्तित्व विकास को स्कूली स्तर से ही अनिवार्य किया जाना चाहिए।

हमें यह समझना होगा कि डिग्री और हुनर एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। डिग्री एक आधार प्रदान करती है और हुनर उस पर इमारत खड़ी करता है। एक कुशल डॉक्टर वही है जिसके पास मेडिकल की डिग्री भी हो और सर्जरी करने का सटीक हुनर भी।

इसी तरह, हर क्षेत्र में इन दोनों का संतुलन आवश्यक है। आने वाला समय केवल उन्हीं का होगा जो अपनी स्किल्स को समय के साथ ‘अपग्रेड’ और ‘री-स्किल’ करते रहेंगे। तकनीक हर पांच साल में बदल रही है, ऐसे में डिग्री तो पुरानी हो सकती है, लेकिन सीखने का हुनर कभी पुराना नहीं होता।

किसी भी राष्ट्र की प्रगति उसके युवाओं के हाथों की कुशलता पर निर्भर करती है। यदि हम अपनी विशाल युवा आबादी को केवल डिग्री बांटते रहे और उन्हें हुनरमंद नहीं बनाया, तो यह ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ हमारे लिए एक ‘जनसांख्यिकीय आपदा’ बन सकता है। हमें रटकर पास होने वाली इस सड़ी-गली व्यवस्था को अलविदा कहना ही होगा। शिक्षा का उद्देश्य केवल पेट पालने के लिए नौकरी पाना नहीं, बल्कि व्यक्ति को आत्मनिर्भर और सक्षम बनाना होना चाहिए।

जब हमारा युवा अपने हाथ में डिग्री के साथ-साथ एक ठोस हुनर लेकर निकलेगा, तब वह न केवल अपना भविष्य संवारेगा, बल्कि भारत को दुनिया की एक आर्थिक महाशक्ति बनाने में भी अपना योगदान देगा। अब समय आ गया है कि हम ‘शिक्षा के अधिकार’ से आगे बढ़कर ‘सार्थक और कुशल शिक्षा के अधिकार’ की बात करें। तभी हमारी शिक्षा प्रणाली वास्तव में रोजगार देने और राष्ट्र निर्माण करने में सक्षम हो सकेगी।

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