मानवता एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ प्रकृति के संकेत अब केवल भविष्यवाणियाँ नहीं रह गए हैं। ग्लोबल वार्मिंग, जिसे दशकों से जलवायु वैज्ञानिकों द्वारा एक दूरगामी खतरे के रूप में पेश किया जा रहा था, अब हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बन चुका है। आज हम जिस दौर में जी रहे हैं, वहाँ मौसम का मिजाज पूरी तरह अनिश्चित हो चुका है।
सर्दियों के मौसम में चिलचिलाती धूप का अहसास होना या गर्मियों के बीच में अचानक बेमौसम मूसलाधार बारिश का होना अब कोई अचरज की बात नहीं रह गई है। ये घटनाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि पृथ्वी का पारिस्थितिक तंत्र बुरी तरह चरमरा गया है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन की हालिया रिपोर्टें बताती हैं कि पिछले कुछ साल मानव इतिहास के सबसे गर्म साल रहे हैं।
धरती के औसत तापमान में हो रही यह वृद्धि केवल थर्मामीटर का पारा ऊपर नहीं चढ़ा रही, बल्कि यह हमारे जीवन के हर पहलू को प्रभावित कर रही है। हिमालय से लेकर अंटार्कटिका तक, ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना समुद्र के जलस्तर को बढ़ा रहा है, जिससे तटीय शहरों के डूबने का खतरा पैदा हो गया है।
भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए यह स्थिति और भी भयावह है। जब धरती तपती है, तो मिट्टी की नमी खत्म हो जाती है, जिससे न केवल फसलों की पैदावार कम होती है, बल्कि भूजल स्तर भी खतरनाक रूप से नीचे चला जाता है।
हाल के वर्षों में हमने देखा है कि जब फसलें कटाई के लिए तैयार होती हैं, तभी विनाशकारी बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि सब कुछ तबाह कर देती है। यह केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि करोड़ों किसानों की उम्मीदों पर वज्रपात है। मानसून के चक्र में आया यह बदलाव सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन का परिणाम है।
समुद्र के गर्म होने से चक्रवातों की तीव्रता बढ़ी है, जो नमी को उन इलाकों तक ले जा रहे हैं जहाँ पहले कभी बेमौसम बारिश नहीं होती थी। यह अनिश्चितता हमारी खाद्य सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
अक्सर हम इन आपदाओं के लिए प्रकृति को दोष देकर अपनी जि़म्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेते हैं। लेकिन हमें यह स्वीकार करना होगा कि ‘कंक्रीट के जंगल’ उगाने की होड़ में हमने असली जंगलों की बलि चढ़ा दी है। शहरीकरण के नाम पर तालाबों को पाट दिया गया और नदियों के बहाव क्षेत्र में अतिक्रमण किया गया।
इसके साथ ही, प्लास्टिक के प्रति हमारा मोह कम होने का नाम नहीं ले रहा है। विकास की अंधी दौड़ में हमने सस्टेनेबल विकास के सिद्धांतों को हाशिए पर रख दिया है। हम यह भूल गए कि पृथ्वी के संसाधन सीमित हैं और उनका दोहन करने की भी एक सीमा होती है।
पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी फाइलों या अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। पेरिस समझौते जैसे वैश्विक मंचों पर बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन जब तक ये नीतियां एक आम नागरिक के व्यवहार का हिस्सा नहीं बनतीं, तब तक बदलाव नामुमकिन है। सरकारें कानून बना सकती हैं, लेकिन उन पेड़ों को बचाने और अपने आस-पास के पर्यावरण को स्वच्छ रखने की जि़म्मेदारी समाज की होती है। अब समय आ गया है कि जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई को ड्राइंग रूम की चर्चा से निकालकर ज़मीन पर उतारा जाए।
‘कैच द रेन’ जैसे अभियानों को केवल नारा न रहने दें। प्रत्येक घर और दफ्तर में वर्षा जल संचयन की व्यवस्था होनी चाहिए। बूंद-बूंद पानी बचाना ही भविष्य की प्यास बुझाने का एकमात्र तरीका है। इसके साथ ही वृक्षारोपण को एक उत्सव बनाना होगा और केवल पेड़ लगाना ही नहीं, उन्हें पालना भी ज़रूरी है। हमें अपनी जीवनशैली को बदलकर ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों को अपनाना होगा और कचरे के सही निस्तारण को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाना होगा।
अंतत:, प्रकृति के पास हमारी ज़रूरतों के लिए तो पर्याप्त संसाधन हैं, लेकिन वह हमारे लालच को शांत नहीं कर सकती। ‘बेमौसम बारिश और तपती धरती’ हमें चेतावनी दे रही है कि समय तेज़ी से हाथ से निकल रहा है। यदि हमने आज अपनी जीवनशैली और प्राथमिकताओं में बदलाव नहीं किया, तो आने वाली पीढ़ियों को विरासत में केवल प्रदूषित हवा, ज़हरीला पानी और एक मरती हुई धरती मिलेगी। पर्यावरण की रक्षा कोई दान या एहसान नहीं, बल्कि हमारे स्वयं के अस्तित्व की रक्षा है। अब नहीं जागे, तो फिर कभी नहीं जाग पाएंगे। यह समय सोचने का नहीं, बल्कि युद्धस्तर पर काम करने का है। धरती को बचाने की इस मुहिम में हर नागरिक को एक सैनिक बनना होगा ताकि हम अपने भविष्य को सुरक्षित कर सकें।



