वाराणसी. चिंता, चिता के समान है. ऐसा इसलिए कहा जाता है, क्योंकि चिंता के कारण शरीर के हेल्थ सिस्टम पर बुरा प्रभाव पड़ता है. अब इस बात पर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय यानी बीएचयू के वैज्ञानिकों ने भी मुहर लगा दी है. हाल में हुए एक रिसर्च के बाद यहां के जंतु विज्ञान विभाग के वैज्ञानिकों ने यह दावा किया है कि जीवन में ज्यादा टेंशन के कारण युवा नपुंसकता के शिकार हो रहे हैं. चूहों पर रिसर्च के बाद बीएचयू के वैज्ञानिकों ने इस तथ्य को सही पाया है.
चौंकाने वाले इस स्टडी में बीएचयू के वैज्ञानिकों ने पाया कि तनाव के कारण लगातार स्पर्म काउंट और उसकी क्वालिटी प्रभावित होती है. यह इंसानों के प्रजनन क्षमता को कम कर देता है. आने वाली पूरी जेनरेशन पर यह रिस्क सबसे ज्यादा है. बीएचयू के जंतु विज्ञान विभाग के प्रोफेसर राघव मिश्रा ने बताया कि उनकी टीम ने एक महीने तक रिसर्च के बाद यह पाया कि मानसिक तनाव स्पर्म काउंट और क्वालिटी दोनों को आधा कर देता है. हर दिन केवल एक से तीन घंटे का टेंशन ही इसके लिए काफी है. इस चौंकाने वाले सच को वैज्ञानिकों ने चूहों पर अलग-अलग स्टेज पर रिसर्च के बाद पाया है. उन्होंने बताया कि उनकी टीम ने चूहों को तीन समूहों में बांट कर उन्हें पारदर्शी बोतल में रखा और उन्हें मेंटल स्ट्रेस दिया. इसमें उन्होंने पाया कि एक सामान्य चूहा, दूसरा ग्रुप जिसे स्ट्रेस दिया गया था और तीसरा जिसे थोड़ा कम देर तक तनाव मिला उनके स्पर्म काउंट में काफी कमी आई. ज्यादा स्ट्रेस वाले चूहे में शुक्राणुओं की संख्या घटकर 8-10 मिलियन प्रति लीटर दर्ज की गई. जबकि सामान्य तौर यह स्तर 15-20 मिलियन होनी चाहिए.
इंसानों में इतना होता है स्पर्म काउंट
प्रोफेसर राघव मिश्रा ने बताया कि चूहों पर हुआ यह रिसर्च मॉडल इंसानों पर हूबहू लागू होता है. इंसानों में स्पर्म काउंट 39 मिलियन से अधिक होना चाहिए. लेकिन जब वो स्ट्रेस में रहते हैं और तनाव यदि लंबे वक्त तक है तो उनका स्पर्म काउंट 19 से 22 मिलियन हो जाता है जो नपुंसकता को बढ़ा सकता है.


