जौनपुर। जब समाज का विश्वास व्यवस्था से उठने लगता है, तो अराजकता धीरे-धीरे अपनी जगह बना लेती है। जौनपुर जैसे ऐतिहासिक जिले में आज जमीनी विवाद केवल कानूनी मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह सामाजिक अस्थिरता का एक गंभीर संकेत बन चुका है।
जौनपुर जमीन विवाद लेखपाल की भूमिका पर उठते सवाल अब खुले तौर पर चर्चा का विषय बन गए हैं।
जौनपुर, जिसे कभी ‘शिराज-ए-हिंद’ के नाम से जाना जाता रहा है, आज उसी धरती पर जमीन के छोटे-छोटे टुकड़ों को लेकर बड़े-बड़े विवाद खड़े हो रहे हैं। यह समस्या अचानक पैदा नहीं हुई है।
जमींदारी उन्मूलन और उसके बाद की चकबंदी प्रक्रियाओं ने जिस तरह के रिकॉर्ड और सीमांकन की विसंगतियां छोड़ीं, वे आज भी विवादों की जड़ बनी हुई हैं। पुराने नक्शों और वर्तमान भू-स्थिति के बीच का अंतर एक ऐसा धुंधला क्षेत्र तैयार करता है, जहां से विवाद जन्म लेते हैं और लेखपालों की भूमिका निर्णायक बन जाती है।
समस्या का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कानून की कमी नहीं है, बल्कि उसके क्रियान्वयन में पारदर्शिता की कमी है।
उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता के तहत लेखपालों को जो अधिकार दिए गए हैं, वे व्यवस्था को सुचारू बनाने के लिए थे, लेकिन जमीनी हकीकत में यही अधिकार कई बार विवादों को बढ़ाने का माध्यम बन जाते हैं। जब किसी पैमाइश या रिपोर्ट को बिना पर्याप्त जांच के अंतिम मान लिया जाता है, तो न्याय की प्रक्रिया कमजोर पड़ती है।
गांवों में यह धारणा तेजी से मजबूत हो रही है कि बिना ‘सुविधा शुल्क’ के कोई काम समय पर नहीं होता। यह केवल भ्रष्टाचार का मामला नहीं है, बल्कि यह उस विश्वास के टूटने का संकेत है, जो प्रशासन और नागरिकों के बीच होना चाहिए। जब एक किसान महीनों तक अपनी जमीन के सीमांकन के लिए भटकता है और दूसरी ओर प्रभावशाली व्यक्ति का काम तेजी से हो जाता है, तो असंतोष हिंसा का रूप ले सकता है।
हाल के वर्षों में कई ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जहां मामूली जमीन विवाद ने गंभीर हिंसा का रूप ले लिया। ऐसे मामलों में यदि प्रारंभिक स्तर पर निष्पक्ष और त्वरित कार्रवाई होती, तो स्थिति को संभाला जा सकता था। यह स्पष्ट है कि प्रशासनिक स्तर पर समन्वय की कमी और जिम्मेदारी तय न होना समस्या को और जटिल बना रहा है।
हालांकि, इस परिदृश्य में उम्मीद की किरण भी दिखाई देती है। डिजिटल रिकॉर्ड, ड्रोन सर्वे और आधुनिक तकनीकों के उपयोग से भूमि अभिलेखों में पारदर्शिता लाई जा सकती है। यदि इन उपायों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए, तो आने वाले समय में विवादों में कमी संभव है। लेकिन तकनीक तभी सफल होगी, जब उसके साथ जवाबदेही और ईमानदारी भी जुड़ी हो।
अब आवश्यकता केवल समस्या की पहचान की नहीं, बल्कि ठोस समाधान की है। लेखपालों की जवाबदेही सुनिश्चित करना, पैमाइश प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना, और राजस्व न्यायालयों को अधिक प्रभावी बनाना समय की मांग है। साथ ही, अधिकारियों को यह समझना होगा कि जमीन केवल संपत्ति नहीं, बल्कि ग्रामीण समाज की पहचान और अस्तित्व का आधार है।
अंततः, यह सवाल केवल जौनपुर का नहीं है, बल्कि पूरे तंत्र की विश्वसनीयता का है। यदि समय रहते सुधार नहीं किए गए, तो जमीनी विवाद सामाजिक ताने-बाने को और कमजोर कर सकते हैं। लेकिन यदि ईमानदारी से प्रयास किए जाएं, तो यही व्यवस्था न्याय और संतुलन की नई मिसाल भी बन सकती है।
(यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।)



