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विश्व के नंबर-2 जैवलिन थ्रोअर रोहित यादव के घर पहुंचे जगदीश सोनकर, परिवार का किया सम्मान

विश्व के नंबर-2 जैवलिन थ्रोअर रोहित यादव की उपलब्धि पर पूर्व विधायक जगदीश सोनकर उनके जौनपुर स्थित आवास पहुंचे। उन्होंने परिवार को सम्मानित करते हुए रोहित की सफलता को प्रदेश और देश का गौरव बताया तथा गांव के विकास और खिलाड़ियों को बेहतर सुविधाएं दिलाने का भरोसा दिया।
Homeविचार/लेखबदलती आबोहवा और नीतिगत उदासीनता: भारत में चरम गर्मी का संकट

बदलती आबोहवा और नीतिगत उदासीनता: भारत में चरम गर्मी का संकट

भारत इस समय जिस भीषण गर्मी का सामना कर रहा है, वह अब केवल मौसम का एक असामान्य उतार-चढ़ाव नहीं रह गया है। यह संकट धीरे-धीरे देश की अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक स्वास्थ्य, श्रम व्यवस्था और सामाजिक ढांचे को प्रभावित करने वाली एक व्यापक आपदा में बदल चुका है।

उत्तर भारत से लेकर मध्य और पश्चिमी भारत तक तापमान लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है। कई शहरों में पारा 47 से 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच रहा है, जबकि रातों का तापमान भी सामान्य से काफी अधिक बना हुआ है।

जलवायु परिवर्तन पर लंबे समय से दी जा रही वैज्ञानिक चेतावनियां अब धरातल पर स्पष्ट दिखाई देने लगी हैं। अंतरराष्ट्रीय जलवायु एजेंसियों से लेकर भारतीय मौसम विभाग तक लगातार यह कह रहे हैं कि आने वाले वर्षों में भारत में हीटवेव की आवृत्ति और तीव्रता दोनों बढ़ेंगी। इसके बावजूद देश की नीतिगत तैयारी अभी भी बेहद कमजोर दिखाई देती है।

दरअसल, गर्मी का यह संकट केवल तापमान बढ़ने का मामला नहीं है। यह सामाजिक असमानता को और अधिक गहरा करने वाला संकट बन चुका है। समाज का संपन्न वर्ग एयर कंडीशनर, जेनरेटर और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के सहारे खुद को सुरक्षित रख सकता है, लेकिन गरीब और श्रमिक वर्ग के पास ऐसे संसाधन उपलब्ध नहीं हैं।

निर्माण स्थलों पर काम करने वाले मजदूर, खेतों में श्रम करने वाले किसान, रेहड़ी-पटरी व्यवसायी, रिक्शा चालक और डिलीवरी कर्मी तपती धूप में काम करने को मजबूर हैं। उनके लिए गर्मी से बचाव कोई विकल्प नहीं, बल्कि रोजी-रोटी का प्रश्न है।

भारत की आर्थिक संरचना का एक बड़ा हिस्सा अनौपचारिक श्रम पर आधारित है। अत्यधिक गर्मी के कारण श्रम उत्पादकता में गिरावट आ रही है। निर्माण परियोजनाएं धीमी पड़ रही हैं, कृषि कार्य प्रभावित हो रहे हैं और छोटे व्यापारियों की आय कम हो रही है। इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि भारत के शहर इस बदलती जलवायु के अनुकूल तैयार ही नहीं किए गए हैं। तेजी से बढ़ते शहरीकरण ने कंक्रीट के विशाल जंगल तो खड़े कर दिए, लेकिन हरित क्षेत्रों, जल निकायों और प्राकृतिक वेंटिलेशन की अनदेखी की गई। शहरों में पेड़ों की कटाई और अत्यधिक सीमेंट-कंक्रीट के उपयोग ने ‘अर्बन हीट आइलैंड’ की समस्या को बढ़ा दिया है।

ग्रामीण भारत भी इस संकट से अछूता नहीं है। अनियमित मानसून, सूखा और बढ़ता तापमान किसानों के लिए नई चुनौतियां पैदा कर रहे हैं। गेहूं जैसी फसलों की उत्पादकता पर असर पड़ रहा है, जबकि पशुधन भी गर्मी और पानी की कमी से प्रभावित हो रहा है।

स्वास्थ्य के मोर्चे पर भी स्थिति गंभीर होती जा रही है। हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और हृदय संबंधी बीमारियों के मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है। सरकारी अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन स्वास्थ्य ढांचा अभी भी पूरी तरह तैयार नहीं है।

यही वह बिंदु है जहां नीतिगत उदासीनता सबसे अधिक दिखाई देती है। हर वर्ष हीटवेव को लेकर चेतावनियां जारी होती हैं, लेकिन अधिकांश उपाय कागजी स्तर से आगे नहीं बढ़ पाते। कई राज्यों के ‘हीट एक्शन प्लान’ प्रभावी क्रियान्वयन के अभाव में केवल दस्तावेज बनकर रह गए हैं।

जरूरत इस बात की है कि हीटवेव को केवल मौसमी समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास चुनौती के रूप में देखा जाए। स्कूलों और कार्यस्थलों के समय में बदलाव, श्रमिकों के लिए सुरक्षित पेयजल, सार्वजनिक कूलिंग सेंटर और हरित शहरीकरण जैसी नीतियों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

ऊर्जा संकट भी इस समस्या को और गंभीर बना रहा है। बढ़ती गर्मी के साथ बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच रही है। कई राज्यों में बिजली कटौती आम हो गई है। विडंबना यह है कि गर्मी से राहत के लिए जिन ऊर्जा साधनों का उपयोग किया जा रहा है, वे कार्बन उत्सर्जन बढ़ाकर जलवायु संकट को और तेज कर रहे हैं।

जलवायु संकट अब केवल पर्यावरण मंत्रालय का विषय नहीं रह गया है। इसे आर्थिक नीति, सार्वजनिक स्वास्थ्य और शहरी विकास नीति के केंद्र में रखना होगा। जब तक सरकारें इस चुनौती को गंभीरता से नहीं लेंगी, तब तक समाधान अधूरा रहेगा।

समाज के स्तर पर भी जागरूकता जरूरी है। जल संरक्षण, पेड़ लगाने के अभियान और वर्षा जल संचयन जैसी पहलें भविष्य की जलवायु सुरक्षा का आधार बन सकती हैं।

आज भारत ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की सबसे बड़ी परीक्षा हो रही है। यदि विकास मॉडल केवल कंक्रीट और अनियंत्रित शहरी विस्तार पर आधारित रहेगा, तो आने वाले वर्षों में गर्मी का संकट और भयावह हो सकता है।

चरम गर्मी अब भविष्य की समस्या नहीं, बल्कि वर्तमान का संकट है। यह केवल मौसम का मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, आर्थिक स्थिरता और मानव जीवन से जुड़ा प्रश्न बन चुका है। अब समय आ गया है कि भारत जलवायु परिवर्तन और हीटवेव के खतरे को राष्ट्रीय प्राथमिकता मानते हुए ठोस और दूरदर्शी कदम उठाए।

(इस लेख में लेखक के निजी विचार हैं।)