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भारतीय अर्थव्यवस्था का विरोधाभास

भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, लेकिन बेरोजगारी, छोटे उद्योगों की कमजोरी, महंगाई और आय असमानता विकास मॉडल की गंभीर चुनौतियों को उजागर कर रही हैं।

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भारतीय अर्थव्यवस्था का विरोधाभास

भारत इस समय विश्व अर्थव्यवस्था के सबसे महत्वपूर्ण देशों में गिना जा रहा है। वैश्विक अस्थिरता, युद्ध, मंदी और भू-राजनीतिक तनावों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत मजबूत दिखाई देती है। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक एवं सामाजिक मामलों के विभाग ने भारत की जीडीपी वृद्धि दर 6.4 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है। यही कारण है कि भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल किया जा रहा है।

लेकिन इस चमकदार तस्वीर का दूसरा पक्ष भी है। आर्थिक विकास की यह गति देश के भीतर व्यापक रोजगार सृजन करने में विफल दिखाई दे रही है। युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी, छोटे उद्योगों की कमजोर स्थिति, महंगाई का दबाव, घटती घरेलू बचत और आय असमानता जैसी समस्याएं विकास मॉडल के गंभीर विरोधाभास को उजागर करती हैं।

दरअसल, किसी भी अर्थव्यवस्था का वास्तविक मूल्यांकन केवल उत्पादन और निवेश के आंकड़ों से नहीं किया जा सकता। आर्थिक प्रगति तभी सार्थक मानी जाती है जब वह आम नागरिक के जीवन स्तर को बेहतर बनाए, रोजगार पैदा करे और सामाजिक स्थिरता को मजबूत करे। भारत में फिलहाल यही सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है।

पिछले कुछ वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि मुख्य रूप से सेवाक्षेत्र, डिजिटल तकनीक, सरकारी पूंजीगत निवेश और बड़े कॉरपोरेट विस्तार के सहारे हुई है। सूचना प्रौद्योगिकी, डिजिटल भुगतान और स्टार्टअप संस्कृति ने भारत की वैश्विक पहचान को मजबूत किया है। विदेशी निवेशकों के लिए भारत एक आकर्षक बाजार बनकर उभरा है।

इसके बावजूद आम नागरिक के जीवन में अपेक्षित बदलाव नहीं दिखता। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में रोजगार की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। विशेष रूप से शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी तेजी से बढ़ रही है। लाखों छात्र डिग्री लेने के बाद भी उपयुक्त रोजगार पाने में संघर्ष कर रहे हैं।

यह स्थिति इसलिए भी गंभीर है क्योंकि भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में शामिल है। यदि युवाओं को शिक्षा, कौशल और रोजगार मिले, तो यही आबादी आर्थिक विकास का सबसे बड़ा इंजन बन सकती है। लेकिन बेरोजगारी बढ़ने पर यही जनसांख्यिकीय लाभांश सामाजिक संकट का रूप ले सकता है।

भारत की अर्थव्यवस्था का दूसरा बड़ा विरोधाभास विकास की प्रकृति से जुड़ा है। बड़े उद्योग, ऑटोमेशन और नई तकनीक आधारित उत्पादन मॉडल आर्थिक वृद्धि तो बढ़ा रहे हैं, लेकिन रोजगार सृजन सीमित कर रहे हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल प्रक्रियाओं के विस्तार से कई क्षेत्रों में मानव श्रम की आवश्यकता कम हो रही है।

दूसरी ओर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। यह क्षेत्र करोड़ों लोगों को रोजगार देता है और ग्रामीण तथा अर्धशहरी अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। कोविड महामारी के बाद बढ़ती लागत, महंगे कर्ज और मांग में कमी ने छोटे उद्योगों की स्थिति कमजोर कर दी है।

छोटे उद्योगों की कमजोरी का सीधा असर रोजगार पर पड़ता है। यदि यह क्षेत्र मजबूत नहीं होगा, तो बेरोजगारी की समस्या और गंभीर होती जाएगी। इसलिए केवल बड़े निवेश और कॉरपोरेट विस्तार के आधार पर अर्थव्यवस्था को टिकाऊ नहीं बनाया जा सकता।

भारत की आर्थिक वृद्धि का लाभ समान रूप से वितरित नहीं हो रहा। आय असमानता लगातार बढ़ रही है। एक छोटा संपन्न वर्ग तेजी से समृद्ध हो रहा है, जबकि मध्यम वर्ग और गरीब तबका आर्थिक दबाव महसूस कर रहा है।

महंगाई ने स्थिति को और कठिन बना दिया है। खाद्य पदार्थों, रसोई गैस, पेट्रोल-डीजल, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती कीमतों ने आम परिवारों का बजट बिगाड़ दिया है। घरेलू बचत में गिरावट भी चिंता का विषय बनती जा रही है।

वैश्विक परिस्थितियां भी भारत के लिए नई चुनौतियां पैदा कर रही हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में तनाव और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है। तेल की कीमतों में वृद्धि का सीधा असर महंगाई और उत्पादन लागत पर दिखाई देता है।

ऐसे समय में भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण रणनीति अपने घरेलू बाजार को मजबूत बनाना है। यदि लोगों की आय बढ़ेगी और रोजगार के अवसर पैदा होंगे, तो घरेलू मांग मजबूत होगी और अर्थव्यवस्था को स्थिर गति मिल सकेगी।

भारत को श्रम-प्रधान उद्योगों पर विशेष ध्यान देना होगा। विनिर्माण, कपड़ा उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण, पर्यटन और हस्तशिल्प जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन की संभावनाएं हैं। साथ ही छोटे और मध्यम उद्योगों को सस्ती पूंजी और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराना जरूरी है।

कौशल विकास भी भारतीय अर्थव्यवस्था की बड़ी जरूरत है। शिक्षा प्रणाली को केवल डिग्री तक सीमित रखने के बजाय व्यावहारिक और तकनीकी दक्षता पर आधारित बनाना होगा। उद्योगों और शिक्षा संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय रोजगार संकट को कम कर सकता है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किए बिना भारत का समग्र विकास संभव नहीं है। कृषि क्षेत्र आज भी करोड़ों लोगों को रोजगार देता है, लेकिन किसानों की आय अपेक्षित स्तर तक नहीं बढ़ सकी है। कृषि आधारित उद्योगों और ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा देना समय की मांग है।

सामाजिक सुरक्षा का विस्तार भी उतना ही जरूरी है। असंगठित क्षेत्र के करोड़ों श्रमिक आज भी स्वास्थ्य बीमा, पेंशन और रोजगार सुरक्षा जैसी सुविधाओं से वंचित हैं। महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ाना भी विकास के लिए आवश्यक है।

हरित अर्थव्यवस्था और नवीकरणीय ऊर्जा भविष्य के विकास मॉडल का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती हैं। सौर ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन और पर्यावरण अनुकूल उद्योग नए रोजगार और निवेश के अवसर पैदा कर सकते हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती विकास की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की है। केवल जीडीपी वृद्धि दर के आधार पर आर्थिक सफलता का दावा नहीं किया जा सकता। विकास तब तक अधूरा रहेगा, जब तक वह रोजगारपरक, समावेशी और संतुलित न हो।

भारत के पास विशाल युवा शक्ति, बड़ा घरेलू बाजार और तकनीकी क्षमता जैसी अनेक ताकतें हैं। यदि इनका सही दिशा में उपयोग किया जाए, तो भारत न केवल तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बन सकता है, बल्कि एक समावेशी और न्यायपूर्ण विकास मॉडल भी स्थापित कर सकता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि आर्थिक विकास की चमक के साथ उसकी सामाजिक गुणवत्ता पर भी समान ध्यान दिया जाए। क्योंकि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति केवल बढ़ते शेयर बाजार और ऊंची इमारतों से नहीं, बल्कि आम नागरिक के जीवन स्तर से तय होती है।

(इस लेख में लेखक के निजी विचार हैं।)

लेकिन इस चमकदार तस्वीर का दूसरा पक्ष भी है। आर्थिक विकास की यह गति देश के भीतर व्यापक रोजगार सृजन करने में विफल दिखाई दे रही है। युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी, छोटे उद्योगों की कमजोर स्थिति, महंगाई का बढ़ता दबाव, घटती घरेलू बचत और आय असमानता जैसी समस्याएं यह संकेत देती हैं कि भारत की विकास यात्रा में गंभीर विरोधाभास मौजूद हैं। प्रश्न यह है कि यदि विकास का लाभ समाज के बड़े हिस्से तक नहीं पहुंच रहा, तो क्या केवल ऊंची जीडीपी दर को सफलता का प्रमाण माना जा सकता है? दरअसल, किसी भी अर्थव्यवस्था का वास्तविक मूल्यांकन केवल उत्पादन और निवेश के आंकड़ों से नहीं किया जा सकता। आर्थिक प्रगति तभी सार्थक मानी जाती है जब वह आम नागरिक के जीवन स्तर को बेहतर बनाए, रोजगार पैदा करे और सामाजिक स्थिरता को मजबूत करे। भारत में फिलहाल यही सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है।

पिछले कुछ वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि मुख्यत: सेवाक्षेत्र, डिजिटल तकनीक, सरकारी पूंजीगत निवेश और बड़े कॉरपोरेट विस्तार के सहारे हुई है। सूचना प्रौद्योगिकी, डिजिटल भुगतान, ई-कॉमर्स और स्टार्टअप संस्कृति ने भारत की वैश्विक छवि को नई पहचान दी है। विदेशी निवेशकों के लिए भारत एक आकर्षक बाजार बनकर उभरा है। सरकार लगातार यह दावा कर रही है कि भारत जल्द ही दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है।

लेकिन इन उपलब्धियों के बावजूद आम नागरिक के जीवन में अपेक्षित बदलाव नहीं दिखता। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में रोजगार की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। विशेष रूप से शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी तेजी से बढ़ रही है। विश्वविद्यालयों और तकनीकी संस्थानों से हर वर्ष लाखों छात्र डिग्री लेकर निकलते हैं, लेकिन उनके लिए पर्याप्त नौकरियां उपलब्ध नहीं हैं।

‘स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया रिपोर्टÓ ने भी इस समस्या को गंभीर बताया है। रिपोर्ट के अनुसार शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी का स्तर अधिक है। इसका अर्थ यह है कि देश की शिक्षा व्यवस्था और उद्योगों की जरूरतों के बीच गहरा अंतर मौजूद है। आज बड़ी संख्या में युवा या तो अस्थायी और कम वेतन वाले काम करने को मजबूर हैं या फिर प्रतियोगी परीक्षाओं और सरकारी नौकरियों की लंबी तैयारी में अपना महत्वपूर्ण समय गंवा रहे हैं।

यह स्थिति इसलिए भी खतरनाक है क्योंकि भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में शामिल है। देश की आबादी का बड़ा हिस्सा कार्यशील आयु वर्ग में है। अर्थशास्त्री इसे ‘जनसांख्यिकीय लाभांशÓ कहते हैं। यदि युवाओं को शिक्षा, कौशल और रोजगार मिले, तो यही आबादी आर्थिक विकास का सबसे बड़ा इंजन बन सकती है। लेकिन यदि यही युवा बेरोजगारी और आर्थिक असुरक्षा से जूझने लगें, तो यह लाभांश सामाजिक संकट में बदल सकता है।

भारत की अर्थव्यवस्था का दूसरा बड़ा विरोधाभास विकास की प्रकृति से जुड़ा है। देश में पूंजी-प्रधान क्षेत्रों का विस्तार तेजी से हुआ है। बड़े उद्योग, ऑटोमेशन और नई तकनीक आधारित उत्पादन मॉडल आर्थिक वृद्धि तो बढ़ा रहे हैं, लेकिन रोजगार सृजन सीमित कर रहे हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स और डिजिटल प्रक्रियाओं ने कई क्षेत्रों में मानव श्रम की आवश्यकता कम कर दी है। इसका लाभ कॉरपोरेट कंपनियों को मिल रहा है, लेकिन आम श्रमिक वर्ग के सामने रोजगार संकट बढ़ रहा है।

कॉरपोरेट क्षेत्र के मुनाफे में लगातार वृद्धि हो रही है। शेयर बाजार नए रिकॉर्ड बना रहा है। बड़ी कंपनियों की संपत्ति तेजी से बढ़ रही है। लेकिन दूसरी ओर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग यानी रूस्रूश्वह्य गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था में रूस्रूश्व क्षेत्र की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र करोड़ों लोगों को रोजगार देता है और ग्रामीण व अर्धशहरी अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। कोविड महामारी के बाद से यह क्षेत्र पूरी तरह उबर नहीं पाया है। बढ़ती लागत, महंगे कर्ज, मांग में कमी और बड़े कॉरपोरेट्स से प्रतिस्पर्धा ने छोटे उद्योगों की स्थिति कमजोर कर दी है। कई इकाइयां बंद हो गईं, जबकि अनेक उत्पादन घटाने को मजबूर हैं।

छोटे उद्योगों की कमजोरी का सीधा असर रोजगार पर पड़ता है, क्योंकि भारत में बड़े उद्योगों की तुलना में रूस्रूश्व क्षेत्र कहीं अधिक लोगों को काम देता है। यदि यह क्षेत्र कमजोर होगा, तो बेरोजगारी बढ़ना स्वाभाविक है। इसलिए केवल बड़े निवेश और विशाल परियोजनाओं के आधार पर अर्थव्यवस्था को मजबूत नहीं बनाया जा सकता।

भारत की आर्थिक वृद्धि का लाभ समान रूप से वितरित नहीं हो रहा। आय असमानता लगातार बढ़ रही है। एक छोटा संपन्न वर्ग अत्यधिक तेजी से समृद्ध हो रहा है, जबकि मध्यम वर्ग और गरीब तबका आर्थिक दबाव महसूस कर रहा है। महंगाई ने स्थिति को और कठिन बना दिया है।

खाद्य पदार्थों, रसोई गैस, पेट्रोल-डीजल, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती कीमतों ने आम परिवार का बजट बिगाड़ दिया है। मध्यम वर्ग, जो भारतीय अर्थव्यवस्था की उपभोग शक्ति का मुख्य आधार माना जाता है, अब खर्चों और बचत के बीच संतुलन बनाने के लिए संघर्ष कर रहा है।

घरेलू बचत में आई गिरावट भी चिंता का विषय है। भारतीय परिवार पारंपरिक रूप से बचत को आर्थिक सुरक्षा का आधार मानते रहे हैं। लेकिन बढ़ती महंगाई और स्थिर आय के कारण अब लोगों की बचत क्षमता कमजोर पड़ रही है। इसका असर केवल परिवारों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। जब लोगों के पास बचत कम होती है, तो निवेश और उपभोग दोनों प्रभावित होते हैं।

महंगाई का सबसे अधिक असर गरीब और निम्न मध्यम वर्ग पर पड़ता है। अमीर वर्ग के लिए बढ़ती कीमतें अस्थायी असुविधा हो सकती हैं, लेकिन गरीब परिवारों के लिए यह जीवन स्तर में गिरावट का कारण बनती हैं। भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतें महंगी होने से सामाजिक असमानता और गहरी होती है।

वैश्विक परिस्थितियां भी भारत के लिए नई चुनौतियां पैदा कर रही हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में संघर्ष और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान ने दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित किया है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयातित कच्चे तेल पर निर्भर है। तेल की कीमतों में थोड़ी वृद्धि भी परिवहन, उत्पादन और उपभोग लागत को बढ़ा देती है। इसका असर अंतत: महंगाई के रूप में आम जनता तक पहुंचता है।

वैश्विक मंदी के कारण निर्यात बाजार भी प्रभावित हो रहे हैं। यूरोप और अमेरिका जैसे बड़े बाजारों में मांग कमजोर पड़ने से भारतीय निर्यातकों की मुश्किलें बढ़ी हैं। यदि वैश्विक अर्थव्यवस्था धीमी पड़ती है, तो भारत की विकास दर पर भी असर पड़ना स्वाभाविक है।

ऐसे समय में भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण रणनीति अपने घरेलू बाजार को मजबूत बनाना है। देश की विशाल आबादी स्वयं एक बड़ा उपभोक्ता बाजार है। यदि लोगों की आय बढ़ेगी और रोजगार के अवसर पैदा होंगे, तो घरेलू मांग मजबूत होगी। यही मांग उद्योगों और निवेश को गति दे सकती है।

भारत को श्रम-प्रधान उद्योगों पर विशेष ध्यान देना होगा। विनिर्माण, कपड़ा उद्योग, चमड़ा उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण, पर्यटन और हस्तशिल्प जैसे क्षेत्रों में रोजगार सृजन की व्यापक संभावनाएं हैं। चीन की आर्थिक सफलता का बड़ा आधार उसका विशाल विनिर्माण क्षेत्र रहा है, जिसने करोड़ों लोगों को रोजगार दिया। भारत भी ‘मेक इन इंडियाÓ जैसी योजनाओं के माध्यम से विनिर्माण को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा है, लेकिन अभी तक अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई है।

इसका एक कारण बुनियादी ढांचे और नीतिगत बाधाएं हैं। बिजली, परिवहन, भूमि अधिग्रहण, नौकरशाही प्रक्रियाएं और वित्तीय कठिनाइयां उद्योगों के विस्तार में बाधा बनती हैं। छोटे और मध्यम उद्योगों को सस्ती पूंजी और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराना आवश्यक है।

कौशल विकास भी भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी जरूरतों में से एक है। आज शिक्षा प्रणाली मुख्यत: डिग्री प्रदान करने तक सीमित हो गई है। उद्योगों को ऐसे प्रशिक्षित युवाओं की जरूरत है, जिनके पास व्यावहारिक और तकनीकी दक्षता हो। लेकिन बड़ी संख्या में छात्र केवल सैद्धांतिक ज्ञान के साथ रोजगार बाजार में प्रवेश करते हैं। इससे उद्योगों और युवाओं के बीच कौशल असंतुलन पैदा होता है।

सरकार को शिक्षा और उद्योगों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना होगा। तकनीकी प्रशिक्षण, व्यावसायिक शिक्षा और उद्योग आधारित पाठ्यक्रमों को बढ़ावा देना समय की मांग है। यदि युवाओं को उनकी क्षमता और बाजार की जरूरतों के अनुसार प्रशिक्षित किया जाए, तो रोजगार संकट काफी हद तक कम हो सकता है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किए बिना भारत का समग्र विकास संभव नहीं है। कृषि क्षेत्र आज भी करोड़ों लोगों को रोजगार देता है, लेकिन किसानों की आय अपेक्षित स्तर तक नहीं बढ़ सकी है। खेती की बढ़ती लागत, जलवायु परिवर्तन, अनिश्चित मानसून और बाजार संबंधी समस्याएं किसानों को संकट में डाल रही हैं।

यदि ग्रामीण आय कमजोर रहेगी, तो घरेलू मांग भी सीमित रहेगी। इसलिए सरकार को कृषि आधारित उद्योगों, खाद्य प्रसंस्करण और ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा देना चाहिए। गांवों में सड़क, बिजली, इंटरनेट और भंडारण सुविधाओं का विस्तार ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकता है।

आर्थिक नीतियों का उद्देश्य केवल विदेशी निवेश आकर्षित करना नहीं होना चाहिए। देश के भीतर उद्यमिता, नवाचार और रोजगार सृजन को भी प्राथमिकता देनी होगी। टैक्स प्रणाली को सरल बनाना, छोटे उद्योगों को राहत देना और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को पारदर्शी बनाना आवश्यक है।

सामाजिक सुरक्षा का विस्तार भी उतना ही जरूरी है। असंगठित क्षेत्र के करोड़ों श्रमिक आज भी स्वास्थ्य बीमा, पेंशन और रोजगार सुरक्षा जैसी सुविधाओं से वंचित हैं। किसी भी आर्थिक संकट का सबसे बड़ा असर इन्हीं वर्गों पर पड़ता है। यदि सरकार सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करती है, तो आर्थिक असमानता कम की जा सकती है।

इसके साथ ही महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ाना भी जरूरी है। भारत में महिला श्रम भागीदारी दर अभी भी कई देशों की तुलना में कम है। यदि महिलाओं को सुरक्षित कार्य वातावरण, समान अवसर और कौशल प्रशिक्षण मिले, तो अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा मिल सकती है।

हरित अर्थव्यवस्था और नवीकरणीय ऊर्जा भी भारत के भविष्य के विकास मॉडल का हिस्सा बन सकती हैं। जलवायु परिवर्तन की चुनौती के बीच सौर ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन और पर्यावरण अनुकूल उद्योग नए रोजगार और निवेश के अवसर पैदा कर सकते हैं।

भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती विकास की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की है। केवल जीडीपी वृद्धि दर के आधार पर आर्थिक सफलता का दावा नहीं किया जा सकता। विकास तब तक अधूरा रहेगा, जब तक वह रोजगारपरक, समावेशी और संतुलित न हो।

सरकार को यह समझना होगा कि आर्थिक नीतियों का अंतिम उद्देश्य केवल आंकड़ों में वृद्धि नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन में सुधार होना चाहिए। यदि आम नागरिक की आय नहीं बढ़ती, युवाओं को रोजगार नहीं मिलता और छोटे उद्योग संघर्ष करते रहते हैं, तो विकास का मॉडल लंबे समय तक टिकाऊ नहीं रह सकता।

भारत के पास विशाल युवा शक्ति, बड़ा घरेलू बाजार, तकनीकी क्षमता और लोकतांत्रिक व्यवस्था जैसी अनेक ताकतें हैं। यदि इन ताकतों का सही दिशा में उपयोग किया जाए, तो भारत न केवल दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बन सकता है, बल्कि एक ऐसी समावेशी और न्यायपूर्ण अर्थव्यवस्था भी स्थापित कर सकता है, जहां विकास का लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंचे। आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत आर्थिक विकास की चमक के साथ उसकी सामाजिक गुणवत्ता पर भी समान ध्यान दे। क्योंकि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति केवल ऊंची इमारतों, बड़े निवेश और बढ़ते शेयर बाजार से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से तय होती है कि उसके आम नागरिक का जीवन कितना सुरक्षित, सम्मानजनक और समृद्ध है। (इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)

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