भारत। भारत 5 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन इस चमकती तस्वीर के पीछे कई जमीनी सच्चाइयाँ भी छिपी हैं।
भारत की आर्थिक यात्रा वास्तव में असाधारण रही है। 1947 में आजादी के समय देश आर्थिक रूप से बेहद कमजोर स्थिति में था। वैश्विक जीडीपी में जो हिस्सेदारी कभी 24% थी, वह घटकर लगभग 3% रह गई थी।
शुरुआती दशकों में योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था ने बुनियादी ढाँचा खड़ा किया, लेकिन लाइसेंस राज ने निजी क्षेत्र की गति सीमित कर दी।
1991 के आर्थिक सुधारों ने भारत की दिशा बदल दी। इसके बाद से देश ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। हाल के वर्षों में संरचनात्मक सुधारों, डिजिटल क्रांति और निवेश-अनुकूल नीतियों ने भारत को दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना दिया है।
आज भारत वैश्विक स्तर पर सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। डिजिटल भुगतान प्रणाली, विशेषकर यूपीआई, ने लेन-देन की पारदर्शिता और गति को नई दिशा दी है। इसके साथ ही उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाओं (PLI) ने विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत किया है।
लेकिन एक संपादकीय दृष्टि से देखें तो यह विकास पूरी तरह संतुलित नहीं दिखता। अर्थव्यवस्था के एक हिस्से में तेज़ वृद्धि है, जबकि दूसरा हिस्सा अब भी संघर्ष कर रहा है। इसे कई विशेषज्ञ “के-शेप्ड ग्रोथ” कहते हैं।
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी है, लेकिन यही ताकत चुनौती भी बन सकती है। रोजगार के अवसर और कौशल विकास के बीच का अंतर लगातार बढ़ रहा है। यदि युवाओं को पर्याप्त अवसर नहीं मिले, तो यह जनसंख्या लाभांश बोझ में बदल सकता है।
ग्रामीण भारत की स्थिति भी चिंता का विषय है। देश की बड़ी आबादी आज भी कृषि पर निर्भर है, लेकिन कृषि की आय और विकास दर अपेक्षाकृत कम है। बढ़ती लागत, अनिश्चित मौसम और सीमित बाजार पहुंच किसानों की आय को प्रभावित कर रही है।
वैश्विक परिस्थितियाँ भी भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती हैं। कच्चे तेल की कीमतें, डॉलर की मजबूती और अंतरराष्ट्रीय संघर्ष जैसे कारक हमारे राजकोषीय संतुलन पर दबाव डालते हैं। ऐसे में ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से काम करना आवश्यक है।
मध्यम वर्ग, जो अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है, खुद को दबाव में महसूस कर रहा है। बढ़ती महंगाई और सीमित बचत क्षमता उसकी क्रय शक्ति को प्रभावित कर रही है। कर व्यवस्था में संतुलन लाना और सामाजिक सुरक्षा बढ़ाना आवश्यक है।
इसके साथ ही, क्षेत्रीय असमानता भी एक बड़ी चुनौती है। दक्षिण और पश्चिम भारत के कई राज्य तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, जबकि उत्तर भारत के कई बड़े राज्य अभी भी विकास की दौड़ में पीछे हैं। संतुलित क्षेत्रीय विकास के बिना समग्र प्रगति संभव नहीं है।
सरकार की बुनियादी ढाँचे से जुड़ी पहलें—जैसे हाईवे, एक्सप्रेसवे और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क—आर्थिक विकास को गति दे रही हैं। लेकिन केवल बुनियादी ढाँचा पर्याप्त नहीं है। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है।
भारत स्टार्टअप इकोसिस्टम में भी तेजी से आगे बढ़ा है, लेकिन घरेलू निवेश की कमी अब भी एक चुनौती है। इसी तरह, महिला श्रम भागीदारी बढ़ाना भी आर्थिक विकास के लिए अनिवार्य है।
अंततः, भारत आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं होना चाहिए। असली सफलता तब होगी जब इसका लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंचे।
यदि पारदर्शिता, तकनीक और समावेशी नीतियों को प्राथमिकता दी जाए, तो भारत न केवल इस लक्ष्य को हासिल करेगा, बल्कि एक संतुलित और टिकाऊ विकास मॉडल भी स्थापित करेगा।
(यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।)



