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जौनपुर में साहबों की ‘चाकरी’ में उलझा बिजली विभाग, फील्ड में लाइनमैनों का टोटा

जौनपुर। नगर क्षेत्र में बिजली विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। विभागीय सूत्रों के अनुसार, शहर में लाइन मेंटेनेंस और बिजली आपूर्ति को सुचारु बनाए रखने के लिए संविदा (निविदा) पर नियुक्त कई कर्मचारी फील्ड में काम करने के बजाय अधिकारियों के आवासों और कार्यालयों में निजी कार्यों में लगे हुए हैं। परिणामस्वरूप, कागजों पर पर्याप्त कर्मचारियों की उपलब्धता होने के बावजूद फील्ड में तकनीकी स्टाफ की कमी बनी हुई है और इसका खामियाजा आम उपभोक्ताओं को भुगतना पड़ रहा है।

फील्ड में कर्मचारियों की कमी, उपभोक्ता परेशान

सूत्रों का दावा है कि दर्जनों संविदाकर्मी लाइन मेंटेनेंस छोड़कर अधिकारियों के बंगलों पर घरेलू कार्यों में लगे हैं, जबकि कुछ कर्मचारी कार्यालयों में बैठकर निजी कागजी और वित्तीय कार्यों में सहयोग कर रहे हैं। ऐसे में किसी क्षेत्र में लाइन फॉल्ट, ट्रांसफार्मर खराब होने या अन्य तकनीकी समस्या आने पर पर्याप्त लाइनमैन उपलब्ध नहीं हो पाते, जिससे घंटों बिजली आपूर्ति बाधित रहती है।

अनफिट और दिव्यांग कर्मियों को भी मानदेय मिलने का आरोप

मामले का दूसरा गंभीर पहलू यह बताया जा रहा है कि विभाग में ऐसे लोगों को भी संविदा पर रखा गया है जो शारीरिक रूप से फील्ड कार्य करने में सक्षम नहीं हैं। सूत्रों के अनुसार, कुछ कर्मचारी पोल पर चढ़कर लाइन मरम्मत जैसे कार्य नहीं कर सकते, फिर भी उन्हें नियमित रूप से मानदेय का भुगतान किया जा रहा है। आरोप है कि ऐसे कर्मचारी या तो कार्यालयों में ही तैनात रहते हैं अथवा केवल उपस्थिति दर्ज कराकर चले जाते हैं।

सांठगांठ के आरोप, बढ़ रहा कार्यभार

सूत्रों का कहना है कि इस व्यवस्था के पीछे कुछ अधिकारियों और कर्मचारी नेताओं की मिलीभगत काम कर रही है। इसके चलते वास्तविक फील्ड कर्मचारियों पर अतिरिक्त कार्यभार बढ़ गया है, जबकि कई संविदाकर्मी वर्षों से गैर-तकनीकी या निजी कार्यों में लगे हुए हैं। इसका असर शहर की बिजली व्यवस्था पर साफ दिखाई देता है।

जांच का विषय: किसके आदेश पर बदली गई ड्यूटी?

नियमानुसार संविदा लाइनमैनों की ड्यूटी फीडर, सब-स्टेशन और फील्ड कार्यों के लिए निर्धारित होती है। ऐसे में यदि बड़ी संख्या में कर्मचारी अधिकारियों के आवासों और कार्यालयों में कार्यरत हैं तो यह जांच का विषय है कि उनकी ड्यूटी किसके आदेश पर बदली गई। यदि कोई लिखित आदेश नहीं है तो जिम्मेदारी किसकी होगी, यह भी महत्वपूर्ण प्रश्न है।

नेताओं के वीटो से थमती रही कार्रवाई

विभागीय सूत्रों का दावा है कि पहले भी कुछ अधिकारियों ने फील्ड कार्य से दूर रहने वाले अथवा कार्य करने में अक्षम संविदाकर्मियों को हटाने या उन्हें वास्तविक कार्यस्थल पर भेजने का प्रयास किया था। हालांकि कर्मचारी नेताओं के विरोध और यूनियन के दबाव के कारण कार्रवाई आगे नहीं बढ़ सकी। यदि यह दावा सही है तो यह विभागीय अनुशासन और प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।