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मध्य-पूर्व का बढ़ता तनाव: वैश्विक व्यवस्था और आर्थिक स्थिरता की अग्निपरीक्षा

अमेरिका-ईरान टकराव से ऊर्जा बाजार, वैश्विक व्यापार और भारत की अर्थव्यवस्था पर मंडराता गहरा संकट

मध्य-पूर्व, जिसे अक्सर वैश्विक भू-राजनीति का हृदय स्थल कहा जाता है, एक बार फिर विनाशकारी संघर्ष की दहलीज पर खड़ा है। हाल के हफ्तों में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने न केवल क्षेत्रीय स्थिरता को खतरे में डाला है, बल्कि वैश्विक व्यवस्था के सामने भी एक अभूतपूर्व संकट खड़ा कर दिया है।

अमेरिकी रक्षा विभाग द्वारा ईरान के खिलाफ संभावित सैन्य विकल्पों की ब्रीफिंग ने कूटनीति के गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। यह केवल दो देशों के बीच का टकराव नहीं है, बल्कि एक ऐसा बहुआयामी संकट है जिसके तार वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार की स्वतंत्रता और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक संतुलन से गहराई से जुड़े हुए हैं। 21वीं सदी के तीसरे दशक में, जब दुनिया पहले से ही यूक्रेन युद्ध और महामारी के बाद के आर्थिक झटकों से जूझ रही है, खाड़ी क्षेत्र में एक नया युद्ध विश्व अर्थव्यवस्था के लिए ‘ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकता है।

ईरान और अमेरिका के बीच तनाव का इतिहास दशकों पुराना है, लेकिन वर्तमान परिदृश्य कहीं अधिक जटिल है। ईरान का परमाणु कार्यक्रम, जिसे वह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए बताता है, वाशिंगटन और उसके सहयोगियों के लिए हमेशा से चिंता का विषय रहा है। संयुक्त व्यापक कार्य योजना के टूटने के बाद से दोनों देशों के बीच अविश्वास की खाई चौड़ी होती गई है।

हालिया सैन्य ब्रीफिंग इस बात का संकेत है कि अमेरिका अब ‘रणनीतिक धैर्यÓ की नीति से आगे बढ़कर ‘सक्रिय प्रतिरोध की ओर बढ़ रहा है। हालांकि, सैन्य विकल्प हमेशा दोधारी तलवार की तरह होते हैं। एक भी गलत अनुमान या उकसावे वाली कार्रवाई पूरे क्षेत्र को ऐसी आग में झोंक सकती है जिसे बुझाना किसी भी महाशक्ति के बस में नहीं होगा। ईरान की भौगोलिक स्थिति और उसके पास मौजूद मिसाइल तकनीक उसे एक ऐसा प्रतिद्वंद्वी बनाती है जिसे कम आंकना अमेरिका के लिए एक बड़ी सामरिक भूल साबित हो सकती है।

इस संभावित संघर्ष का सबसे तात्कालिक और विनाशकारी प्रभाव वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ेगा। खाड़ी क्षेत्र दुनिया का ऊर्जा केंद्र है, और यहाँ से होने वाली आपूर्ति में किसी भी तरह का व्यवधान अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों को अनियंत्रित स्तर पर पहुँचा सकता है।

विशेष रूप से ‘हॉर्मुज जलडमरूमध्य’ की भूमिका यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण है। दुनिया का लगभग पांचवां हिस्सा तेल इसी संकरे समुद्री मार्ग से गुजरता है। ईरान ने बार-बार चेतावनी दी है कि यदि उसकी संप्रभुता पर हमला हुआ, तो वह इस मार्ग को अवरुद्ध कर देगा। यदि ऐसा होता है, तो वैश्विक कच्चे तेल की कीमतें $150 से $200 प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर सकती हैं। यह स्थिति विकसित और विकासशील दोनों तरह की अर्थव्यवस्थाओं में मुद्रास्फीति का एक ऐसा चक्र शुरू करेगी जो आर्थिक मंदी को अपरिहार्य बना देगा।

ऊर्जा की बढ़ती कीमतें परिवहन, विनिर्माण और कृषि लागत को सीधे प्रभावित करेंगी, जिससे आम आदमी की थाली से लेकर उद्योगों के उत्पादन तक सब कुछ महंगा हो जाएगा। भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से देखें तो ईरान-अमेरिका संघर्ष केवल इन दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा। यह अनिवार्य रूप से एक क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले लेगा। ईरान के पास लेबनान में हिजबुल्ला, यमन में हूती विद्रोहियों और इराक एवं सीरिया में विभिन्न मिलिशिया समूहों का एक मजबूत नेटवर्क है।

जैसे ही संघर्ष शुरू होगा, ये ‘प्रॉक्सिस’ सक्रिय हो जाएंगे, जिससे इजरायल और सऊदी अरब जैसे अमेरिकी सहयोगी सीधे निशाने पर होंगे।

लाल सागर और अदन की खाड़ी में जहाजों पर होने वाले हमले पहले से ही वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को बाधित कर रहे हैं। पूर्ण विकसित युद्ध की स्थिति में, स्वेज नहर के माध्यम से होने वाला व्यापार पूरी तरह से ठप हो सकता है, जिससे यूरोप और एशिया के बीच माल ढुलाई का समय और लागत दोनों कई गुना बढ़ जाएंगे। यह आर्थिक वैश्वीकरण के दौर में एक ऐसा व्यवधान होगा जिससे उबरने में दुनिया को दशक लग सकते हैं।चीन और रूस की भूमिका इस पूरे समीकरण को और अधिक पेचीदा बना देती है।

यूक्रेन युद्ध के बाद रूस और ईरान के बीच रक्षा सहयोग एक नए स्तर पर पहुँच गया है। रूस, जो खुद पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है, ईरान को एक महत्वपूर्ण रणनीतिक सहयोगी के रूप में देखता है।

दूसरी ओर, चीन मध्य-पूर्व में अपनी मध्यस्थ की भूमिका को मजबूत कर रहा है, जैसा कि हमने हाल ही में सऊदी-ईरान समझौते में देखा। अमेरिका द्वारा ईरान पर किसी भी सैन्य हमले को चीन और रूस अपनी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं और सुरक्षा के लिए खतरे के रूप में देखेंगे। यह स्थिति एक नए ‘शीत युद्धÓ या उससे भी बदतर, एक ‘मल्टी-पोलर’ संघर्ष को जन्म दे सकती है जहाँ महाशक्तियाँ सीधे या परोक्ष रूप से आमने-सामने होंगी। संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं, जो पहले से ही प्रभावहीनता के आरोपों का सामना कर रही हैं, इस बड़े संकट को रोकने में कितनी सक्षम होंगी, यह एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। भारत जैसे देशों के लिए, यह स्थिति एक रणनीतिक दुविधा और बड़ी चुनौती पेश करती है। भारत अपनी तेल जरूरतों का 80 प्रतिशत से अधिक आयात करता है और खाड़ी क्षेत्र उसकी ऊर्जा सुरक्षा का प्राथमिक स्रोत है। कीमतों में कोई भी भारी उछाल भारत के राजकोषीय घाटे को बिगाड़ देगा और घरेलू महंगाई को असहनीय स्तर पर पहुँचा देगा।

इसके अतिरिक्त, खाड़ी देशों में रहने वाले लगभग 90 लाख भारतीय प्रवासी न केवल भारत के लिए विदेशी मुद्रा का एक बड़ा स्रोत हैं, बल्कि उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना भारत सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होगी। युद्ध की स्थिति में इतने बड़े पैमाने पर निकासी अभियान चलाना एक अभूतपूर्व लॉजिस्टिक और सुरक्षा चुनौती होगी। इसके अलावा, भारत का चाबहार बंदरगाह और ‘उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा’ प्रोजेक्ट, जो मध्य-एशिया तक भारत की पहुंच सुनिश्चित करते हैं, पूरी तरह से ठप हो सकते हैं। इस जटिल परिस्थिति में समाधान का रास्ता सैन्य विकल्पों के बजाय कूटनीतिक संवाद में ही निहित है।

इतिहास गवाह है कि मध्य-पूर्व में सैन्य हस्तक्षेपों ने अक्सर उन समस्याओं को और उलझाया है जिन्हें वे हल करने चले थे। अफगानिस्तान, इराक और लीबिया के उदाहरण बताते हैं कि शासन परिवर्तन या सैन्य बल का प्रयोग अक्सर लंबे समय तक चलने वाली अस्थिरता और उग्रवाद को जन्म देता है। अमेरिका को अपनी रणनीति में लचीलापन लाते हुए क्षेत्रीय शक्तियों को विश्वास में लेना होगा। ईरान को भी यह समझना होगा कि अंतरराष्ट्रीय अलगाव और लगातार संघर्ष उसकी अपनी अर्थव्यवस्था और जनता के हित में नहीं है। एक नए ‘क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे’ की आवश्यकता है जिसमें ईरान, सऊदी अरब, इजरायल और अन्य प्रमुख देश आपसी मतभेदों को न्यूनतम करने के लिए एक मंच पर आ सकें। ईरान और अमेरिका के बीच का वर्तमान तनाव दुनिया को एक ऐसे अंधेरे मोड़ पर ले आया है जहाँ से वापसी का रास्ता केवल संयम और दूरदर्शिता से ही संभव है।

वैश्विक समुदाय को यह समझना होगा कि 21वीं सदी की परस्पर जुड़ी हुई दुनिया में ‘स्थानीय युद्ध’ जैसी कोई चीज नहीं होती; हर संघर्ष के वैश्विक परिणाम होते हैं। यदि कूटनीति विफल होती है और युद्ध की शुरुआत होती है, तो इसकी कीमत केवल तेहरान या वाशिंगटन नहीं चुकाएंगे, बल्कि पूरी दुनिया को इसकी भारी आर्थिक और मानवीय कीमत चुकानी होगी। समय की मांग है कि महाशक्तियाँ अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के बजाय वैश्विक शांति और स्थिरता को प्राथमिकता दें। शांति केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि मानवता के भविष्य के लिए एक अनिवार्यता है। यदि आज हम संवाद के दरवाजे बंद करते हैं, तो भविष्य की पीढ़ियां हमें इस ऐतिहासिक विफलता के लिए कभी क्षमा नहीं करेंगी।

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