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धर्म और राजनीति का गठजोड़: क्या जनता के असली मुद्दे पीछे छूट रहे हैं?

भारत। धर्म और राजनीति गठजोड़ आज भारतीय लोकतंत्र के सामने एक गंभीर प्रश्न बनकर खड़ा है—क्या इस प्रक्रिया में जनता के असली मुद्दे कहीं खोते जा रहे हैं?

भारत अपनी विविधता के लिए जाना जाता है। यहां अनेक धर्म, भाषाएं और संस्कृतियां सदियों से साथ-साथ विकसित हुई हैं। संविधान ने इसी विविधता को सुरक्षित रखते हुए देश को धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र का स्वरूप दिया। इसका मूल भाव यह था कि राज्य सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार करेगा और आस्था को व्यक्तिगत क्षेत्र में सम्मान मिलेगा।

लेकिन समय के साथ एक नया रुझान उभरा है, जहां धर्म और राजनीति के बीच की दूरी कम होती दिख रही है। यह संबंध केवल प्रतीकात्मक नहीं रहा, बल्कि चुनावी रणनीति और जनमत निर्माण का एक प्रमुख साधन बन गया है।

लोकतंत्र का मूल उद्देश्य नागरिकों की समस्याओं का समाधान करना होता है। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, महंगाई और बुनियादी सुविधाएं किसी भी सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। लेकिन जब राजनीतिक विमर्श धर्म आधारित होने लगता है, तो ये मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। बहस भावनाओं पर केंद्रित हो जाती है और जीवन से जुड़े वास्तविक प्रश्न धीरे-धीरे चर्चा से गायब होने लगते हैं।

धर्म का उद्देश्य समाज में नैतिकता, सहिष्णुता और सद्भाव स्थापित करना है। वहीं राजनीति का कार्य प्रशासन और नीति निर्माण है। दोनों अपने-अपने क्षेत्र में संतुलित रहें, तो समाज स्वस्थ रहता है। लेकिन जब धर्म का उपयोग सत्ता प्राप्ति के साधन के रूप में होने लगे, तो लोकतांत्रिक संतुलन बिगड़ जाता है।

चुनावी दौर में अक्सर देखा जाता है कि धार्मिक प्रतीकों और भावनात्मक मुद्दों को प्रमुखता दी जाती है। इससे मतदाता का ध्यान विकास से हटकर पहचान आधारित निर्णयों की ओर चला जाता है। परिणामस्वरूप, नागरिक यह पूछना भूल जाता है कि उसके क्षेत्र में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की स्थिति क्या है।

इस प्रवृत्ति का सबसे बड़ा प्रभाव सामाजिक ताने-बाने पर पड़ता है। समाज धीरे-धीरे विभाजित होने लगता है। नागरिकों की पहचान उनके कार्य या नागरिकता से अधिक धर्म के आधार पर होने लगती है। इससे आपसी विश्वास कमजोर होता है और तनाव का वातावरण बनता है।

युवाओं पर इसका असर विशेष रूप से चिंताजनक है। युवा ऊर्जा और नवाचार के प्रतीक होते हैं, लेकिन जब वे विभाजनकारी बहसों में उलझ जाते हैं, तो उनकी रचनात्मक क्षमता प्रभावित होती है। जो समय कौशल विकास, शिक्षा या उद्यमिता में लग सकता था, वह भावनात्मक विवादों में खर्च हो जाता है।

मीडिया की भूमिका भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाती है। जब समाचारों में वास्तविक मुद्दों के बजाय धार्मिक विवादों को अधिक स्थान मिलता है, तो जनमत भी उसी दिशा में प्रभावित होता है। इससे लोकतंत्र की प्राथमिकताएं बदलने लगती हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में भी यह प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। जहां विकास, कृषि और रोजगार जैसे मुद्दे प्रमुख होने चाहिए, वहां भी चर्चा कई बार पहचान आधारित राजनीति पर केंद्रित हो जाती है। इससे मूल समस्याएं जस की तस बनी रहती हैं।

धर्म आधारित राजनीति का एक बड़ा खतरा जवाबदेही का कम होना है। जब वोट भावनाओं के आधार पर पड़ते हैं, तो प्रदर्शन का मूल्यांकन कमजोर हो जाता है। इसके विपरीत, यदि वोट विकास पर आधारित होंगे, तो शासन की गुणवत्ता स्वतः बेहतर होगी।

यह समझना जरूरी है कि धर्म स्वयं समस्या नहीं है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब धर्म को राजनीतिक साधन बना दिया जाता है। आस्था का सम्मान होना चाहिए, लेकिन उसका उपयोग विभाजन के लिए नहीं होना चाहिए।

समाधान की शुरुआत जागरूक नागरिक से होती है। मतदाता को यह तय करना होगा कि उसका वोट काम और नीतियों पर आधारित होगा, न कि भावनात्मक अपील पर। शिक्षा, जिम्मेदार मीडिया और युवाओं की सकारात्मक भागीदारी इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

अंततः, भारत की ताकत उसकी विविधता और लोकतांत्रिक मूल्यों में है। यदि राजनीति फिर से विकास और जनहित के मुद्दों पर केंद्रित होती है, तो यह लोकतंत्र को मजबूत बनाएगी। अन्यथा, धर्म और राजनीति का यह गठजोड़ जनता के वास्तविक प्रश्नों को लगातार पीछे धकेलता रहेगा।

लोकतंत्र की असली सफलता तब होगी, जब नागरिक अपने अधिकारों और जरूरतों को प्राथमिकता देंगे और वोट विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मानजनक जीवन के आधार पर देंगे।

(यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।)

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