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पूरनपुर में अंडरपास निर्माण की मांग पर डीआरएम का निरीक्षण, ग्रामीणों को मिली नई उम्मीद

पूरनपुर गांव के सामने बंद किए गए रेलवे मार्ग पर अंडरपास निर्माण की मांग को लेकर डीआरएम वाराणसी ने निरीक्षण किया। ग्रामीणों को उम्मीद है कि स्वीकृति मिलने के बाद वर्षों पुरानी आवागमन समस्या का समाधान होगा।
Homeविचार/लेखआर्थिक असमानता : एक गहरी होती खाई

आर्थिक असमानता : एक गहरी होती खाई

भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, लेकिन इस विकास का वितरण समान नहीं है। हालिया रिपोर्ट्स जैसे ऑक्सफैम और वर्ल्ड इनइक्वलिटी रिपोर्ट के आंकड़े डराने वाले हैं। भारत की कुल संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा देश के मात्र 1% अमीरों के पास है, जबकि नीचे की 50% आबादी के पास कुल संपत्ति का बहुत छोटा हिस्सा है।

यह असमानता केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अवसरों की असमानता पैदा करती है।

एक अमीर परिवार का बच्चा बेहतरीन शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएँ पाता है, जबकि गरीब परिवार का बच्चा बुनियादी सुविधाओं के लिए भी संघर्ष करता है। यह खाई ‘पूंजीवादी विकास’ के उस मॉडल की ओर इशारा करती है जहाँ विकास का लाभ ‘ट्रिकल डाउन’ होकर आम आदमी तक नहीं पहुँच पा रहा है।

बेरोजगारी: एक जलता हुआ मुद्दा

आर्थिक असमानता का सबसे बड़ा कारण और परिणाम बेरोजगारी है। भारत के पास ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ है, यानी हमारे पास युवाओं की विशाल आबादी है। लेकिन अगर इन युवाओं को काम न मिले, तो यही लाभांश एक ‘जनसांख्यिकीय आपदा’ बन सकता है।

कौशल की कमी

भारत में हर साल लाखों इंजीनियर्स और ग्रेजुएट्स निकलते हैं, लेकिन उद्योग जगत की जरूरतों के हिसाब से उनके पास कौशल की कमी होती है। शिक्षा प्रणाली और बाजार की मांग के बीच एक बड़ा फासला है।

मशीनीकरण और एआई

उद्योगों में ऑटोमेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते दखल ने कम कुशल वाले श्रमिकों के लिए नौकरियों के अवसर कम कर दिए हैं।

कृषि पर निर्भरता

आज भी भारत की लगभग आधी आबादी खेती पर निर्भर है, जबकि जीडीपी में कृषि का योगदान लगातार घट रहा है। खेती में ‘प्रच्छन्न बेरोजगारी’ बड़ी समस्या है, जहाँ ज़रूरत से ज़्यादा लोग एक ही काम में लगे हैं।


मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग का संघर्ष

बढ़ती महंगाई और स्थिर आय ने मध्यम वर्ग की कमर तोड़ दी है। जहाँ कॉरपोरेट सेक्टर का मुनाफा बढ़ रहा है, वहीं संगठित और असंगठित क्षेत्र में वेतन उस अनुपात में नहीं बढ़ा है।

‘गिग इकोनॉमी’ ने रोजगार तो दिए हैं, लेकिन उनमें सामाजिक सुरक्षा का अभाव है।


समाधान की राह

इस खाई को पाटने के लिए सरकार और समाज को मिलकर ठोस कदम उठाने होंगे।

समावेशी विकास

नीतियाँ ऐसी होनी चाहिए जो केवल जीडीपी न बढ़ाएं, बल्कि जमीनी स्तर पर रोजगार पैदा करें। एमएसएमई सेक्टर को बढ़ावा देना सबसे कारगर उपाय हो सकता है क्योंकि यह सबसे ज़्यादा रोजगार देता है।

कर प्रणाली में सुधार

प्रगतिशील कराधान के ज़रिए अमीरों पर उचित कर लगाकर उस पैसे को सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश किया जाना चाहिए।

स्किल इंडिया का प्रभावी कार्यान्वयन

शिक्षा को केवल किताबी न रखकर उसे ‘रोजगारपरक’ बनाना होगा। व्यावसायिक प्रशिक्षण को स्कूली स्तर से ही अनिवार्य करना चाहिए।


आर्थिक असमानता और बेरोजगारी केवल आर्थिक मुद्दे नहीं हैं, बल्कि ये सामाजिक अस्थिरता का कारण भी बन सकते हैं। यदि समय रहते युवा हाथों को काम और गरीब को विकास में हिस्सेदारी नहीं मिली, तो देश का सर्वांगीण विकास का सपना अधूरा रह जाएगा।