- अब नही सुनाई देती कजरी की धुन, अश्लील द्विअर्थी गीतों ने पारंपरिक गीत और संस्कार को किया धूमिल
जौनपुर धारा, सिरकोनी। अरे रामा भादो रैन अंधियारी, बदरिया छाई रे हरि…से लेकर अब बरस भेज भैय्या को बाबुल सावन में लीजो बुलाये रे…कजरी के बोल बदल गए है। अश्लील गीतों के आगे अब कजरी की उमंग भी गायब होने लगी है। आज से करीब दो ढाई दशक पूर्व तक गाँव में कजरी को लेकर सावन के पहले दिन से ही उत्साह देखने को मिलता था। सावन के दिनों में होने वाले चहल-पहल के अलावा दूर-दूर तक कही इसकी झलक भी नही दिखाई नही दे रही है। समय के साथ पारंपरिक संस्कार भी औपचारिक होते जा रहे हैं।

कजरी की पुरानी परम्परा बदलने लगी। कान में जरइ रखने की पुरानी परंपरा गायब होने लगी है। आज के माहौल में कही-कही गांवों में कान में जरइ रखने की परम्परा होती है। इस परंपरा के उत्साह में काफी कमी आ गयी है।अब सिर्फ इसका कोरम भर पूरा किया जाता है। कजरी के नाम पर अब अभद्र संस्कृति जरूर हावी होती जा रही है। पूर्व के समय गाँव में सावन के पहले ही दिन से लोग झूला डालने व कजरी की तैयारियों में लोग लग जाते थे। गाँव के बड़े बुज़ुर्ग, युवक, युवतियों के साथ कजरी के राग शुरू कर देते थे। इसके बाद 30दिनों तक हर एक रात में कजरी वâा माहौल होता था। जरइ को उगाने के लिए महिलाएं दूर से मिट्टी को लाकर उसमें जौं को गोंदती थी। उसके बाद बहुत सफाई से दोनों समय सेवा करती थी। जरइ को लेकर महिलाओं के साथ होड़ लगी रहती थी। कजरी के मेले के दिन अपने भाइयों के कानों पर जरइ रखती थी। अब पुरानी सावन व कजरी देखने को नही मिलती है। कजरी के पुराने गीतों की जगह भोजपुरिया गंदे भाव के कजरी गीत का चलन बढ़ गया है। गाँव की चौपालों पर बड़े बुजुर्गों की जमघट कजरी के गीत गाने के लिए अब नही लगती है। न ढोलक की थाप ,न झाल की आवाज न कोयल बिन बगिया का सुनहरा धुन… अब सुनाई देती है। कजरी गीत धीरे-धीरे अब बिलुप्त होती जा रही है। कुछे जगहों पर महिलाओं की टोली निकलती है। जो मंदिरों व पूजा स्थलों पर गीत-गाकर अपने दायित्वों का निर्वहन कर लौट जाते है। उसमे भी नाम मात्र के लोग शामिल होते है। जिससे कजरी मिठास में कमी आयी है।



