जौनपुर शहर की पहचान शाही पुल, ऐतिहासिक इमारतों और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी है, लेकिन इन सबके बीच गोमती नदी का महत्व सबसे अलग है। गोमती केवल एक नदी नहीं, बल्कि जौनपुर की जीवनरेखा रही है।
वर्षों से इसी नदी के किनारे शहर बसा, खेती हुई, व्यापार चला और लोगों का जीवन आगे बढ़ा। कभी गर्मियों में भी गोमती में पर्याप्त पानी रहता था। घाटों पर चहल-पहल होती थी, नाव चलती थीं और लोग नदी से जुड़े रहते थे। लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है। गर्मी बढ़ते ही गोमती का जलस्तर तेजी से घटने लगता है और इसके साथ जौनपुर में जलसंकट भी गहराने लगता है।
गोमती नदी का बदलता स्वरूप
वर्तमान समय में जौनपुर के लोगों के लिए पानी सबसे बड़ी चिंता बनता जा रहा है। अप्रैल और मई आते ही गोमती का बहाव कमजोर पड़ जाता है। कई स्थानों पर नदी की चौड़ाई तो दिखाई देती है, लेकिन बीच में सिर्फ पतली धारा बचती है। किनारों पर रेत, कूड़ा और जलकुंभी जमा दिखाई देती है। जहां कभी साफ पानी बहता था, वहां अब सूखा और गंदगी नजर आती है।
यह स्थिति केवल सौंदर्य की समस्या नहीं, बल्कि जीवन और संसाधनों का संकट है।
भूजल भी तेजी से नीचे जा रहा
पिछले कुछ वर्षों में गोमती का जलस्तर लगातार घटा है। इसके साथ भूजल स्तर भी नीचे गया है। पहले जहां 40 से 50 फीट पर पानी मिल जाता था, अब कई क्षेत्रों में 80 से 100 फीट तक बोरिंग करनी पड़ रही है। शहर के कई हैंडपंप गर्मियों में जवाब दे देते हैं।
नगर क्षेत्र में ट्यूबवेलों पर दबाव बढ़ जाता है। मोहल्लों में पानी की सप्लाई अनियमित हो जाती है और लोगों को घंटों इंतजार करना पड़ता है।
जलसंकट के मुख्य कारण
1. ऊपर से कम पानी पहुंचना
गोमती का उद्गम उत्तर प्रदेश के दूसरे हिस्से में है और वहां से बहते हुए यह जौनपुर पहुंचती है। रास्ते में कई स्थानों पर पानी का उपयोग सिंचाई और अन्य जरूरतों के लिए होता है। गर्मियों में नीचे के क्षेत्रों तक कम पानी पहुंचता है।
2. भूजल का अत्यधिक दोहन
जौनपुर जिले में खेती के लिए बड़ी संख्या में निजी बोरिंग और ट्यूबवेल लगाए गए हैं। धान, गन्ना और अधिक पानी वाली फसलें भूजल पर दबाव डालती हैं।
3. प्रदूषण
शहर का गंदा पानी, नालों का बहाव और कूड़ा-कचरा लंबे समय से गोमती में गिरता रहा है। कई स्थानों पर बिना शोधन के सीवर का पानी नदी में पहुंचता है।
4. बदलता मौसम
वर्षा का स्वरूप अब पहले जैसा नहीं रहा। कभी बहुत तेज बारिश होती है और कभी लंबे समय तक सूखा पड़ता है। गर्मी का तापमान बढ़ने से पानी तेजी से सूखता है।
शहर के लोगों पर असर
इस जलसंकट का असर सबसे पहले आम लोगों पर पड़ता है। शहर के कई मोहल्लों में पानी की सप्लाई सीमित समय के लिए होती है। लोग सुबह जल्दी उठकर बाल्टी, ड्रम और टंकी भरते हैं।
जहां सप्लाई नहीं पहुंचती, वहां लोग हैंडपंप या टैंकर पर निर्भर हो जाते हैं। गरीब परिवारों को सबसे अधिक परेशानी होती है।
गांवों और किसानों की मुश्किलें
गांवों की स्थिति भी चिंताजनक है। कई गांवों में हैंडपंप सूख जाते हैं या बहुत कम पानी देते हैं। किसान सिंचाई के लिए डीजल पंप या गहरी बोरिंग का सहारा लेते हैं, जिससे लागत बढ़ जाती है।
यदि समय पर पानी न मिले तो सब्जी, दलहन और अन्य फसलें खराब हो जाती हैं। कई किसान गर्मियों में खेती कम कर देते हैं।
पशुपालन और स्वास्थ्य पर असर
जब तालाब और पोखरे सूख जाते हैं, तब पशुओं के लिए पानी की समस्या खड़ी हो जाती है। कई बार गर्मी के कारण पशु बीमार भी पड़ जाते हैं।
पानी की कमी होने पर लोग असुरक्षित या दूषित पानी पीने लगते हैं। इससे डायरिया, पेट के रोग, त्वचा रोग और अन्य बीमारियां बढ़ती हैं।
आर्थिक नुकसान भी बड़ा
खेती में नुकसान होने से किसानों की आय घटती है। सब्जियों की पैदावार कम होने पर बाजार में कीमतें बढ़ती हैं। छोटे दुकानदार, दूध व्यवसायी और खाद्य कारोबार भी प्रभावित होते हैं।
शहर में पानी खरीदने की मजबूरी से घरेलू खर्च बढ़ता है।
समाधान क्या हो सकते हैं?
सरकार और प्रशासन स्तर पर कई प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन इन्हें तेज करना होगा।
जरूरी कदम:
- गोमती में गंदा पानी जाने से रोकना
- सीवर शोधन संयंत्र पूरी क्षमता से चलाना
- वर्षा जल संचयन बढ़ाना
- ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई अपनाना
- तालाबों और पोखरों का पुनर्जीवन
- पानी बचाने के लिए जागरूकता अभियान
गोमती को बचाना क्यों जरूरी है?
गोमती केवल पानी का स्रोत नहीं, बल्कि जौनपुर की पहचान है। यदि नदी कमजोर होगी तो शहर का भविष्य भी प्रभावित होगा। सरकार, प्रशासन, किसान, व्यापारी और आम नागरिकों को मिलकर काम करना होगा।
समय रहते कदम उठाए गए तो गोमती फिर से स्वच्छ और प्रवाहमान बन सकती है। यदि लापरवाही जारी रही, तो आने वाले वर्षों में जौनपुर को और गंभीर संकट झेलना पड़ सकता है।
इसलिए यह समय चेतावनी का भी है और अवसर का भी। गोमती को बचाना मतलब जौनपुर के भविष्य को बचाना है।



