जौनपुर : जिले भर में ईद उल अजहा का त्योहार श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। त्योहार के मद्देनजर बुधवार शाम को बाजारों में खरीदारों की भारी भीड़ देखने को मिली। सेवईं और खोवा की दुकानों पर देर रात तक खरीदारी होती रही। वहीं बकरा मंडी में भी बकरों की खरीदारी करने वालों की काफी भीड़ देखी गई।
सुबह नमाज के बाद कुर्बानी का सिलसिला शुरू हो जाएगा। मुस्लिम मोहल्लों में त्योहार को लेकर विशेष रौनक दिखाई दे रही है। ईद के बाद यह मुसलमानों का दूसरा सबसे बड़ा त्योहार माना जाता है।
सवा आठ बजे होगी नमाज
ईद उल अजहा, जिसे बकरीद भी कहा जाता है, इस्लाम धर्म का एक प्रमुख और पवित्र त्योहार है। यह पर्व हर वर्ष इस्लामी कैलेंडर के जुल हिज्जा महीने में मनाया जाता है।
हर साल की तरह इस बार भी जनपद में त्योहार को लेकर विशेष उत्साह देखा जा रहा है। ईदगाह और उसके आसपास साफ-सफाई की व्यवस्था पूरी कर ली गई है। जिला प्रशासन की ओर से सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं।
जानकारी के अनुसार ईदगाह में सुबह सवा आठ बजे ईद उल अजहा की नमाज अदा की जाएगी।
सेवईं और खोवा की दुकानों पर भीड़
ईद उल अजहा के मौके पर घरों में सेवईं बनाने की परंपरा भी निभाई जाती है। इसी कारण बुधवार देर रात तक बाजारों में सेवईं और खोवा खरीदने वालों की भीड़ लगी रही।
इस बार बाजार में अलग-अलग कीमतों पर सेवईं उपलब्ध रहीं, जिन्हें लोगों ने अपनी जरूरत के अनुसार खरीदा।
बकरा मंडी में रही खास रौनक
बकरीद पर सबसे अधिक खरीदारी बकरों की होती है। मुस्लिम समाज के लोग नमाज अदा करने के बाद कुर्बानी करते हैं। पिछले एक सप्ताह से नवाब साहब के हाते में बकरा मंडी सजी हुई है, जहां विभिन्न नस्लों और कीमतों के बकरे मौजूद हैं।
बकरीद की पूर्व संध्या पर देर रात तक लोग बकरे खरीदते नजर आए। बाजार में बकरों की कीमत सात-आठ हजार रुपये से लेकर एक लाख रुपये तक रही।
कई आकर्षक और सुंदर बकरे लोगों के बीच खास आकर्षण का केंद्र बने रहे। व्यापारियों को अच्छे दाम भी मिले, हालांकि कुछ व्यापारियों को मोलभाव के कारण अपने बकरे वापस ले जाने पड़े।
व्यापारियों का कहना था कि बकरों के पालन-पोषण और देखभाल में काफी खर्च आता है। ऐसे में उचित कीमत नहीं मिलने पर बिक्री करना घाटे का सौदा साबित होता है।
कुर्बानी के गोश्त के तीन हिस्से
इस्लाम धर्म में कुर्बानी के गोश्त को तीन हिस्सों में बांटने की परंपरा है। पहला हिस्सा अपने और परिवार के लिए रखा जाता है। दूसरा हिस्सा रिश्तेदारों, दोस्तों और पड़ोसियों में बांटा जाता है, जबकि तीसरा हिस्सा गरीबों, यतीमों और जरूरतमंदों को दिया जाता है।
इसी परंपरा के तहत कुर्बानी के बाद लोग गोश्त को बराबर हिस्सों में बांटते हैं।



