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बढ़ता तापमान, सुलगते शहर और थर्मल असमानता का नीतिगत संकट

वैश्विक जलवायु परिवर्तन अब कोई दूरस्थ पर्यावरणीय चेतावनी नहीं, बल्कि एक कठोर सामाजिक और आर्थिक वास्तविकता बन चुका है। भारत इस समय रिकॉर्ड तोड़ गर्मी और हीटवेव की चपेट में है। देश के कई हिस्सों में तापमान 45 से 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका है, जो केवल मौसम का बदलाव नहीं बल्कि विकास मॉडल और नीतिगत विफलताओं का गंभीर संकेत है।

गर्मी ने बढ़ाई सामाजिक असमानता

आज अत्यधिक गर्मी समाज के सभी वर्गों को समान रूप से प्रभावित नहीं कर रही। यह एक नई “थर्मल असमानता” को जन्म दे रही है, जहां सुरक्षित और ठंडे वातावरण तक पहुंच भी आर्थिक स्थिति पर निर्भर होती जा रही है।

एक ओर वातानुकूलित घरों, पावर बैकअप और बंद कार्यालयों में रहने वाला संपन्न वर्ग है, जबकि दूसरी ओर दिहाड़ी मजदूर, रेहड़ी-पटरी वाले, निर्माण श्रमिक, किसान और डिलीवरी कर्मी हैं, जिन्हें भीषण गर्मी में भी काम करने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

मजदूर वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित

देश का विशाल अनौपचारिक श्रमिक वर्ग अत्यधिक गर्मी के दौरान काम रोकने की स्थिति में नहीं होता। उनके लिए एक दिन काम न करने का मतलब परिवार की रोजी-रोटी पर सीधा असर पड़ना है।

तपती सड़कों, टिन की छतों और बिना वेंटिलेशन वाले घरों में रहने वाला यह वर्ग हर दिन अपनी सेहत और जीवन को खतरे में डाल रहा है। मौजूदा श्रम कानून भी खुले में काम करने वाले मजदूरों को पर्याप्त सुरक्षा देने में विफल दिखाई देते हैं।

जल संकट ने बढ़ाई परेशानी

बढ़ती गर्मी के साथ देश में जल संकट भी गहराता जा रहा है। शहरों में कंक्रीट के बढ़ते विस्तार ने वर्षा जल के प्राकृतिक पुनर्भरण को प्रभावित किया है। परिणामस्वरूप भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है।

गर्मी के मौसम में गरीब बस्तियों में पानी के टैंकरों के पीछे लंबी कतारें और विवाद आम हो चुके हैं। दूसरी तरफ संपन्न इलाकों में पानी का उपयोग बिना किसी रोकटोक के जारी रहता है। यह जल असमानता सामाजिक तनाव को और बढ़ा रही है।

अर्थव्यवस्था पर भी असर

अत्यधिक गर्मी का असर देश की अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देने लगा है। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, हीटवेव के कारण भारत आने वाले वर्षों में अपने कार्य घंटों का बड़ा हिस्सा खो सकता है।

निर्माण कार्य, कृषि और आउटडोर सेक्टर की उत्पादकता तेज गर्मी के दौरान काफी घट जाती है। बिजली की मांग बढ़ने से पावर ग्रिड पर दबाव बढ़ता है और बिजली कटौती की समस्या भी गहराती है।

नीतियों की कमी उजागर

हालांकि केंद्र और राज्य सरकारों ने “हीट एक्शन प्लान” तैयार किए हैं, लेकिन उनका प्रभावी क्रियान्वयन अभी भी चुनौती बना हुआ है। अधिकांश योजनाएं केवल एडवाइजरी जारी करने तक सीमित नजर आती हैं।

आउटडोर श्रमिकों के लिए अनिवार्य विश्राम, सुरक्षित पेयजल, ओआरएस और कार्य समय में बदलाव जैसे प्रावधान अब भी व्यापक स्तर पर लागू नहीं हो सके हैं।

शहरीकरण बना बड़ी वजह

विशेषज्ञों के अनुसार अनियोजित शहरीकरण भी इस संकट का प्रमुख कारण है। कंक्रीट और डामर आधारित शहर “अर्बन हीट आइलैंड” में बदलते जा रहे हैं, जहां रात में भी तापमान सामान्य नहीं हो पाता।

तालाबों, हरित पट्टियों और पारंपरिक जल स्रोतों के खत्म होने से शहरों की प्राकृतिक शीतलता भी समाप्त होती जा रही है।

क्या होने चाहिए समाधान?

विशेषज्ञों का मानना है कि “कूलिंग” यानी शीतल वातावरण तक पहुंच को एक बुनियादी नागरिक अधिकार के रूप में स्वीकार करना होगा।

इसके लिए जरूरी है कि:

  • अत्यधिक गर्मी को राष्ट्रीय आपदा घोषित किया जाए
  • श्रम कानूनों में बदलाव हो
  • शहरी वनीकरण बढ़ाया जाए
  • वर्षा जल संचयन को अनिवार्य बनाया जाए
  • सार्वजनिक कूलिंग सेंटर स्थापित किए जाएं
  • गरीब परिवारों के लिए जलवायु-अनुकूल आवास विकसित किए जाएं

भविष्य के लिए चेतावनी

बढ़ता तापमान और सुलगते शहर प्रकृति की ओर से दी जा रही गंभीर चेतावनी हैं। यदि समय रहते नीतियों में बदलाव नहीं किया गया, तो भविष्य में भारतीय शहर रहने योग्य नहीं रह जाएंगे।

यह संकट केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि मानवाधिकार, सामाजिक न्याय और आर्थिक स्थिरता का भी प्रश्न बन चुका है। अब आवश्यकता तात्कालिक राहत से आगे बढ़कर दीर्घकालिक और समावेशी नीतियों पर काम करने की है।

(इस लेख में लेखक के निजी विचार हैं।)

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