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सिर्फ डिग्री नहीं, जीवन बनाने का माध्यम: भारत की शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सोच

सिर्फ डिग्री नहीं, जीवन बनाने का माध्यम

शिक्षा किसी भी समाज की रीढ़ होती है। यह केवल किताबी ज्ञान या परीक्षा पास करने का नाम नहीं है। असली शिक्षा वह है जो इंसान को सोचना सिखाए, सवाल करना सिखाए और सही-गलत में फर्क करना सिखाए। आज जब भारत 2026 में नई तकनीकों और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के दौर से गुजर रहा है, तब हमें अपनी शिक्षा व्यवस्था पर गंभीरता से सोचना होगा।

नंबरों की दौड़ बनी शिक्षा की सबसे बड़ी समस्या

हमारी सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि हमने शिक्षा को नंबरों की दौड़ बना दिया है। 90 प्रतिशत लाना सफलता का पैमाना बन गया है, लेकिन बच्चा असल जिंदगी में कितना सक्षम है, यह कोई नहीं पूछता। रटने की आदत ने सोचने की क्षमता छीन ली है।

गांवों के स्कूलों में आज भी शिक्षकों की कमी है और शहरों में महंगी कोचिंग ने पढ़ाई को व्यापार बना दिया है। नई शिक्षा नीति 2020 ने बदलाव की कोशिश जरूर की, लेकिन ज़मीन पर उसका असर अभी धीमा है।

डिग्री है, लेकिन हुनर नहीं

आज कई ग्रेजुएट डिग्री लेकर निकलते हैं, मगर कंपनियां अक्सर कहती हैं कि उम्मीदवार काम के लायक नहीं हैं। कारण साफ है कि हम बच्चों को पुराना सिलेबस पढ़ा रहे हैं, जबकि दुनिया एआई, डेटा और क्लाइमेट टेक की बात कर रही है।

क्या होने चाहिए बड़े बदलाव

1. रटने से समझने की ओर बढ़ना होगा

हर बच्चे में कोई न कोई हुनर होता है। किसी को कोडिंग पसंद है तो किसी को संगीत। शिक्षा का काम उस हुनर को पहचानकर तराशना है, न कि सबको एक ही साँचे में ढालना।

2. शिक्षकों की बेहतर ट्रेनिंग जरूरी

एक अच्छा शिक्षक पूरी पीढ़ी बदल सकता है। शिक्षकों को नए तरीके, तकनीक और बच्चों का मनोविज्ञान सिखाना जरूरी है। साथ ही उनका सम्मान और वेतन भी बेहतर होना चाहिए।

3. किताब और स्किल का मेल

12वीं तक आते-आते हर छात्र के हाथ में कोई न कोई स्किल होनी चाहिए। चाहे वह बिजली ठीक करना हो, वेबसाइट बनाना हो या खेती के नए तरीके सीखना। डिग्री के साथ हुनर होगा तभी बेरोजगारी घटेगी।

तकनीक मदद कर सकती है, शिक्षक की जगह नहीं

आज मोबाइल हर हाथ में है। अगर इसका सही इस्तेमाल हो तो गांव का बच्चा भी आईआईटी का लेक्चर देख सकता है। सरकार के दीक्षा और स्वयं जैसे प्लेटफॉर्म अच्छे कदम हैं, लेकिन इन्हें और आसान तथा सभी भाषाओं में उपलब्ध कराना होगा।

फिर भी याद रखना होगा कि स्क्रीन कभी शिक्षक की जगह नहीं ले सकती। तकनीक मदद कर सकती है, रिश्ता नहीं बना सकती।

शिक्षा का असली मकसद

शिक्षा का मकसद केवल नौकरी दिलाना नहीं, बल्कि बेहतर नागरिक बनाना है। ऐसा नागरिक जो तर्क करे, नवाचार करे और मुश्किल वक्त में देश को रास्ता दिखाए।

इसके लिए माता-पिता को नंबरों की जिद छोड़नी होगी, समाज को डिग्री से आगे सोचना होगा और सरकार को नीति से ज्यादा नीयत पर काम करना होगा।

क्योंकि आखिर में, क्लासरूम में आज जो बोया जाएगा, वही कल देश काटेगा।

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)