प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देशहित में नागरिकों से एक साल तक सोने के नए आभूषण न खरीदने और विदेशी यात्राओं को टालने की हालिया अपील ने देश की व्यापक आर्थिक प्राथमिकताओं पर एक गंभीर बहस को जन्म दे दिया है। हैदराबाद की एक जनसभा से देश के नाम किया गया यह आह्वान कोई सामान्य बजटीय घोषणा या नियामक प्रतिबंध नहीं है, बल्कि यह आर्थिक देशभक्ति और भू-राजनीतिक सुरक्षा के नाम पर नागरिकों से स्वैच्छिक योगदान की मांग करता है।
सोना आयात और विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ता दबाव
पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव, कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में आ रहे व्यवधानों के बीच देश के आर्थिक ढांचे को सुरक्षित रखना निस्संदेह किसी भी संप्रभु सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। वर्तमान वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत का स्वर्ण आयात बिल रिकॉर्ड 72 बिलियन डॉलर के पार पहुंच चुका है, जो कच्चे तेल के बाद देश का दूसरा सबसे बड़ा आयात खर्च है।
ऐसे में देश के कीमती विदेशी मुद्रा भंडार को बचाने की प्रधानमंत्री की चिंता पूरी तरह तर्कसंगत और राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से अनिवार्य प्रतीत होती है। परंतु, इस वृहद् आर्थिक हित की वेदी पर देश के सबसे प्राचीन, रोजगारपरक और सांस्कृतिक रूप से गहरे जुड़े सर्राफा उद्योग को जिस अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है, उस पर भी एक अत्यंत गंभीर, व्यापक और संवेदनशील नीतिगत विमर्श की आवश्यकता है।
सर्राफा बाजार में मंदी और ग्राहकों का असमंजस
इस राष्ट्रीय अपील का सबसे पहला और तात्कालिक प्रभाव देश के खुदरा स्वर्ण बाजारों पर देखने को मिला है। राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक चांदनी चौक और कूचा महाजनी से लेकर मुंबई के झावेरी बाजार और उत्तर प्रदेश, बिहार व दक्षिण भारत के तमाम क्षेत्रीय बाजारों में इस समय एक अभूतपूर्व गतिरोध की स्थिति है।
विवाह और त्योहारों के इस मुख्य सीजन में, जब भारतीय परिवारों में पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं के तहत सोने की सबसे अधिक खरीदारी होती है, तब देश के छोटे-बड़े ज्वेलरी शोरूमों पर ग्राहकों की आवाजाही में 50 प्रतिशत तक की भारी गिरावट दर्ज की गई है।
बाजारों से यह सन्नाटा केवल नए ग्राहकों की कमी के कारण नहीं है, बल्कि समाज में व्याप्त एक गहरे नीतिगत असमंजस का परिणाम है। प्रधानमंत्री के शब्दों को देश की जनता एक कड़े संदेश के रूप में देख रही है, जिसके चलते आम मध्यमवर्गीय और संपन्न परिवारों में यह भ्रम फैल गया है कि इस अवधि में किसी भी प्रकार का स्वर्ण लेन-देन करना राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के विरुद्ध या कानूनन संदिग्ध हो सकता है।
कारीगरों और स्वर्णकारों की आजीविका पर संकट
इस बाजार मंदी की सबसे मारक, अदृश्य और दर्दनाक चोट उस वर्ग पर पड़ी है जो भारतीय सर्राफा उद्योग की रीढ़ की हड्डी है—देश के लाखों स्थानीय कारीगर, नक्काशी विशेषज्ञ और दैनिक वेतनभोगी स्वर्णकार।
भारत में आभूषण निर्माण का क्षेत्र काफी हद तक विकेंद्रीकृत और असंगठित है, जहां पीढ़ियों से हुनरमंद कारीगर बड़े शोरूमों और छोटे व्यापारियों से ऑर्डर लेकर अपने घरों या छोटी कार्यशालाओं में दिन-रात हाथ से बारीक काम करते हैं।
खुदरा बाजारों में मांग के अचानक शून्य हो जाने के कारण इन कार्यशालाओं में पूरी तरह सन्नाटा पसर गया है। जब बड़े शोरूमों में ही फुटफॉल आधी रह गई है और नई बुकिंग्स को एक साल के लिए टाल दिया गया है, तो इन कारीगरों को मिलने वाले गढ़ाई और नक्काशी के दैनिक ऑर्डर लगभग बंद हो चुके हैं।
आर्थिक देशभक्ति और व्यापारिक संतुलन की चुनौती
भारतीय सर्राफा उद्योग और व्यापारी वर्ग ने हमेशा देश की संप्रभुता और आर्थिक स्थिरता का समर्थन किया है। मौजूदा दौर में भी व्यापारी सरकार की इस मंशा से पूरी तरह सहमत हैं कि डॉलर के रूप में देश का पैसा गैर-जरूरी सोने के आयात में बहकर बाहर नहीं जाना चाहिए।
परंतु व्यापारियों का यह भी तर्क है कि देश के विदेशी मुद्रा भंडार की रक्षा करने की इस कोशिश में घरेलू अर्थव्यवस्था के एक जीवंत हिस्से को पूरी तरह निष्क्रिय कर देना आत्मघाती साबित हो सकता है। वर्तमान में ज्वेलरी क्षेत्र की प्रमुख राष्ट्रीय कंपनियों के शेयरों में 10 से 12 प्रतिशत तक की गिरावट देखी गई है, जो इस क्षेत्र में बढ़ती आर्थिक अनिश्चितता को दर्शाती है।
‘ओल्ड गोल्ड एक्सचेंज’ मॉडल बन सकता है समाधान
इस आर्थिक गतिरोध से उबरने और राष्ट्रहित तथा जनहित के बीच संतुलन स्थापित करने का सबसे व्यावहारिक मार्ग ‘ओल्ड गोल्ड रीसाइक्लिंग अर्थव्यवस्था’ को संस्थागत रूप देने में निहित है।
सरकार को विभिन्न जनसंचार माध्यमों से यह स्पष्ट करना चाहिए कि रोक केवल बाहर से आने वाले नए सोने के आयात पर केंद्रित है, जबकि देश के भीतर पहले से मौजूद सोने के पुनः उपयोग या एक्सचेंज पर कोई प्रतिबंध नहीं है।
यदि ग्राहकों के मन से यह भ्रम दूर हो जाए, तो लोग अपनी शादियों और पारिवारिक आयोजनों के लिए पुराने आभूषणों को रीसायकल कर नए डिजाइन में बदलवा सकते हैं। इससे देश में नए सोने का आयात घटेगा, विदेशी मुद्रा की बचत होगी और घरेलू बाजार भी सक्रिय बना रहेगा।
गोल्ड रीसाइक्लिंग से अर्थव्यवस्था को मिल सकते हैं तीन बड़े लाभ
पहला लाभ यह होगा कि नए सोने पर निर्भरता कम होगी और भारत का स्वर्ण आयात बिल नियंत्रित किया जा सकेगा।
दूसरा लाभ यह होगा कि पुराने सोने को गलाकर नए आभूषण बनाने की प्रक्रिया से लाखों कारीगरों और स्वर्णकारों को लगातार काम मिलता रहेगा, जिससे रोजगार संकट कम होगा।
तीसरा लाभ यह होगा कि बाजार में व्यापारिक गतिविधियां जारी रहने से जीएसटी और अन्य करों के रूप में सरकार को राजस्व प्राप्त होता रहेगा।
संतुलित नीति ही बनेगी स्थायी समाधान
यह समय भावनात्मक अपीलों और आर्थिक यथार्थ के बीच संतुलन बनाने का है। किसी भी देश की आर्थिक प्रगति केवल विदेशी मुद्रा भंडार के आंकड़ों से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों की आजीविका की सुरक्षा और आर्थिक आत्मविश्वास से मापी जाती है।
सरकार और सर्राफा उद्योग को मिलकर इस नीतिगत असमंजस को दूर करना होगा, ताकि देश का विदेशी मुद्रा भंडार भी सुरक्षित रहे, लाखों कारीगरों की रोजी-रोटी भी बची रहे और भारतीय बाजारों की आर्थिक गतिविधियां भी प्रभावित न हों।
भारत के लिए यह समय केवल आर्थिक अनुशासन का नहीं, बल्कि व्यावहारिक और संतुलित आर्थिक नीति अपनाने का भी है। यदि सरकार ‘ओल्ड गोल्ड एक्सचेंज’ और गोल्ड रीसाइक्लिंग मॉडल को स्पष्ट नीति समर्थन देती है, तो यह संकट देश के लिए एक नए आर्थिक अवसर में बदल सकता है।
अंततः विकास तभी सार्थक माना जाएगा जब राष्ट्रीय हित और आम नागरिक की आजीविका दोनों समान रूप से सुरक्षित रह सकें।



