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सपा और BJP दोनों खेमों में चिंता, मैनपुरी में इन वोटर्स के भरोसे है भाजपा

उत्तर प्रदेश में हुए उपचुनाव में वोटिंग के बाद भाजपा और सपा दोनों खेमें में चिंता का माहौल है. रामपुर में सपा के खेमे में बेचैनी देखने को मिल रही है तो वहीं खतौली सीट पर बीजेपी चिंता में है और इसके अलावा सबसे चर्चित सीट मैनपुरी पर तो बीजेपी और सपा दोनों ने ही जीत के दावे किए हैं. मुलायम सिंह यादव के निधन से खाली हुई मैनपुरी लोकसभा सीट में वोटिंग के बाद अब दोनों दलों के दावे सामने आने लगे हैं. बीजेपी ने तीनो सीटों पर अपनी जीत के दावे किए हैं तो समाजवादी पार्टी का दावा है कि उन्होंने अपना गढ़ बचा लिया है. वोटिंग के बाद अब सभी दल पोलिंग बूथों पर पड़े वोटों का हिसाब किताब लगाने में जुट गए हैं. बीजेपी जहां 1-1 बूथ पर पड़े वोटों की गिनती में जुटी है तो वहीं समाजवादी पार्टी भी बूथ दर बूथ अपनी इस लड़ाई के नफे-नुकसान के हिसाब किताब में लगी है. लेकिन मैनपुरी में लगभग 15 फीसदी वोटिंग कम होने से समाजवादी पार्टी में बेचैनी देखी जा रही है. बीजेपी मैनपुरी में जीत के दावे जरूर कर रही है लेकिन उसकी उम्मीद उन साइलेंट वोटों पर टिकी है जो बिल्कुल चुप है और समाजवादी पार्टी के खिलाफ कभी बसपा को तो कभी अपने स्वजातीय प्रत्याशियों को वोट करता रहा है. समाजवादी पार्टी के नेताओं का आंकलन है कि एक बार फिर उन्हें जसवंतनगर में बंपर लीड मिलेगी, करहल में वो काफी मार्जिन से आगे रहेंगे, किशनी में थोड़े मतों से आगे होंगे, लेकिन भोगांव और मैनपुर सदर विधानसभा में थोड़े मतों से बीजेपी पीछे रह सकती है. ऐसे में जसवंतनगर, करहल और किशनी की जीत उन्हें मैनपुरी चुनाव में निर्णायक लीड दे देगी. वहीं मैनपुरी में बीजेपी का आंकलन दलित वोटों और साइलेंट वोटों पर टिका है. बीजेपी का आंकलन है कि समाजवादी पार्टी को यादव वोट, मुस्लिम वोट और थोड़े-थोड़े वोट सभी जातियों से मिलेंगे. जबकि बीजेपी को शाक्य, सैनी सहित सभी ओबीसी के वोटों का बड़ा-बड़ा हिस्सा मिला है, मायावती के वोट खासकर दलितों में जाटों वोट उन्हें चुपचाप बड़ी तादाद में मिले, जो साइलेंट वोटर हैं. इसके अलावा सवर्णों में बड़ी तादाद में बीजेपी को वोट मिले हैं और यह सभी वोट बीजेपी को निर्णायक जीत दे सकते हैं. हालांकि बीजेपी का मानना है कि कांटे का चुनाव है और वह बहुत थोड़े अंतर से यह सीट जीतेगी. जबकि समाजवादी पार्टी का दावा है कि वह एक बार फिर बड़े अंतर से और मुलायम सिंह यादव से भी ज्यादा वोटों से डिंपल यादव जीतेंगी क्योंकि इस बार सहानुभूति का वोट उन्हें नहीं मिल रहा है. अगर डिंपल यादव चुनाव जीतती हैं तो चाचा शिवपाल ही एक्स फैक्टर होकर उभरेंगे. क्योंकि सभी विधानसभाओं में जसवंत नगर ही समाजवादी पार्टी को सबसे ज्यादा बढ़त देगा. करहल अखिलेश यादव का विधानसभा क्षेत्र है तो जसवंतनगर शिवपाल यादव का. ऐसे में इन दोनों की निर्णायक लीड ही डिंपल यादव की जीत तय करेगी. लेकिन बीजेपी ने जिस तरीके से दलित वोटों पर अपनी नजरें गड़ाईं और खासकर सपा से नाराज रहने वाले वोटरों को साधा है, इसने सपा खेमे में थोड़ी बेचैनी बढ़ाई है. इन चुनावों के दौरान कई लोग ऐसे भी मिले हैं, जो करहल और जसवंत नगर में ऊपर से कुछ और और अंदर से कुछ और नजर आए. हालांकि समाजवादी पार्टी के लोग दावा कर रहे हैं कि डिंपल यादव मुलायम सिंह यादव से भी ज्यादा वोटों से जीतेंगे. लेकिन अंदरूनी तौर पर सपा के लोग यह मानते हैं कि इस बार लड़ाई कड़ी है और जीत का मार्जिन कम होने जा रहा है. रामपुर में इस बार बीजेपी बेहद कम वोटिंग होने की वजह से गदगद दिखाई दे रही है, जबकि समाजवादी पार्टी के खेमे में जबरदस्त मायूसी और बेचैनी है. रामपुर वह सीट है जहां 55 से 60 फीसदी मुसलमान वोटर है और इस बार वोट प्रतिशत इतिहास में सबसे कम हुआ है. करीब 33-34 फीसदी ही वोटिंग रामपुर सीट पर हुई है, जिससे बीजेपी को लगता है कि मुसलमानों की नाराजगी आजम खान के खिलाफ उभर कर आई है. बीजेपी का दावा है कि बीजेपी का अपना वोट उन्हें मिला है, खासकर हिंदू वोट और वह वोट भी मिला है जो मुसलमानों में आजम खान से नाराज रहा है. ऐसे में अगर इतनी कम वोटिंग हुई है तो इसका सीधा असर आजम खान के वोटरों की वजह से है, जो वोट देने नहीं निकले. समाजवादी पार्टी का आरोप है कि समाजवादी पार्टी के वोटरों को निकलने नहीं दिया गया. उनकी पूरी कोशिश थी कि सपा के वोटर मतदान केंद्र तक ना पहुंच पाएं और प्रशासन इस में सफल रहा है. यह दावा समाजवादी पार्टी के बड़े नेताओं का है. बीजेपी इस सीट को लेकर इस बार आश्वस्त दिखाई दे रही है और उससे लग रहा है कि पहली बार रामपुर सदर की सीट को जीतने जा रही है, वहीं आजम खान का परिवार और समाजवादी पार्टी दोनों खेमे में चिंता की लकीरें साफ दिखाई दे रही हैं. खतौली में बीजेपी के लिए चिंता बढ़ी है. खतौली में जिस तरीके से मुस्लिम, जाट, गुर्जर और दलितों के एक बड़े वर्ग ने वोटिंग में आरएलडी का साथ दिया है, इससे बीजेपी खेमे में बेचैनी है बीजेपी पिछला चुनाव महज साढे़ 16 हजार वोटों से जीती थी, लेकिन इस बार बीजेपी के कोर वोटरों में बिखराव दिखा है. चंद्रशेखर ने युवा दलित वोटरों में अपनी जगह बनाई है और यह दलित वोटरों में दिखा है कि उन्होंने आरएलडी के तरफ भी कुछ हद तक रुख किया है. बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चिंता का सबब यही है कि उसके कोर वोटर ने खतौली में आरएलडी का साथ दिया. बीजेपी का दावा है कि इस नुकसान के बावजूद दलितों का एक बड़ा हिस्सा उनके साथ रहा ओबीसी उनके साथ है और बीजेपी का जो अपना मतदाता है उसने भी साथ दिया है. ऐसे में खतौली सीट अंततः उनके ही झोली में आएगी. खतौली में आरएलडी के गुर्जर कैंडिडेट मदन भैया को गुर्जरों ने साथ दिया है यह बात निकल कर आ रही है. वह गुर्जर जो बीजेपी के वोटर माने जाते हैं उसमें बड़ी तादाद आरएलडी के साथ गए हैं और यही बीजेपी के लिए चिंता का सबब है.