- जब पुलिस ही करेगी प्रॉपर्टी का व्यापार, तो गरीबों को कैसे मिलेगा अधिकार
- नियम विरूद्ध खेती की जमीनों पर बन जमीन पर बस रही कॉलोनियां
जौनपुर धारा, जौनपुर। जमीनी विवाद को लेकर अक्सर पुलिस पर पैसे लेकर पक्षपात करने के आरोप लगता रहता है। आये दिन पुलिस अधीक्षक के पास इस तरह के मामले पहुँचतें रहतें है कि स्थानीय थाना की मिली भगत से जमीन पर कब्जा कराया जा रहा है और फिर मामले की जाँच चलती रहती है। लेकिन जौनपुर शहर कोतवाली क्षेत्र के कई पुलिस कर्मियों की लिप्तता जमीनी व्यापार में पाई जा रही है। प्रदेश सरकार गरीबों के हक को लेकर जितनी गंभीर है, और समय-समय पर उनके साथ इंसाफ के निर्देश देती रहती है। वहीं इन दिनों नगर कोतवाली पुलिस खेती की जमीन को दूसरे प्रयोजन के लिए किसानों से औने-पौने दाम में सौदा कर प्लाटिंग कर रही है। मामले में पुलिस होने के कारण गरीब आवाज उठाने से डरतें हैं। वहीं किसानों के खेती की जमीन पर कॉलोनी विकास या अन्य कार्यों के लिए औने-पौने दाम पर सौदा कर उँâचे दामों पर बेचकर करोड़पति बनने का ख्वाब देख रहें है। नियमों पर गौर करें तो कोई भी खेती की जमीन को खरीद तो सकता है, लेकिन इसका उपयोग सिर्फ खेती के लिए ही किया जा सकेगा। कृषि की जमीन का उपयोग कॉलोनी विकास या अन्य कार्यों के लिए नहीं किया जा सकता। मिली जानकारी के अनुसार शहर कोतवाली क्षेत्र के कुछ पुलिस कर्मी जमीनी मामलों में पैसा लगाकर प्लाटिंग का कार्य कर रहें है। जिसमें जमीन के असल मालिक से औने-पौने दाम पर जमीन क्रय कर कई टूकड़ों में प्लाट बनाकर बेचने का मामला संज्ञान में आ रहा है। जमीन एक व्यक्ति की जिंदगी का वह अनमोल हिस्सा होती है। जिसके लिए वह अपनी जीवन की महत्वपुर्ण कमाई को निवेश करता है। एक व्यक्ति के जमीन खरीदने के पीछे अलग अलग कारण हो सकते हैं। कोई घर बनाने के लिए जमीन लेता है। तो कोई उस जमीन पर व्यापार करने के लिए लेता है। जो स्वयं के लिये जमीन लेता है वह तो किसान को सही दाम दे जाता है लेकिन जो व्यक्ति व्यापार के नियत से जमीन क्रय करता है। उससे किसान केवल छला ही जाता है। ऐसे मामलों में यदि पुलिस खुद सौदेबाजी में लिप्त पाई जाती है तो भला गरीब न्याय की उम्मीद कैसे और किससे करें? इन तरह के मामलों पर जिले के उच्चाधिकारियों को संज्ञान लेकर गम्भीर होना चाहिये। नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब न्यायालय में अधिकतर मामले पुलिस और जमीदार के बीच पाया जायेगा।
- ऐसी भी क्या जरूरत जो नौकरी से नहीं हो रही पूरी ?
- पुलिस कर्मी से प्लाटर तक के सफर में आखिर ऐसी कौन सी जरूरत आन पड़ी कि नौकरी के साथ ही जमीनी व्यापार में पैसा निवेश करना पड़ रहा है? पुलिस की नौकरी में रहकर सरकारी पगार के अलावा वर्दीधारी के जमीनी करोबार की तरफ रूख अख्तियार करना यह साबित करता है कि ऐसे कर्मी पुलिस की नौकरी से संतुष्ट नहीं है जिसके कारण उनके द्वारा प्रापर्टी के व्यापारों में पैसे लगाने की नौबत आ रही है।



