― Advertisement ―

spot_img
Homeअपना जौनपुरहैलो कौन! भइया जरा रमेश को बुला दीजिये, मैं उनकी बहन हूँ...

हैलो कौन! भइया जरा रमेश को बुला दीजिये, मैं उनकी बहन हूँ…

  • खत्म हो गया एसटीडी, आईएसडी, पीसीओ का दौर
  • बहुत ही खूबसूरत और उत्तेजक था अपने बारी की प्रतीक्षा वाला समय

जौनपुर धारा, जौनपुर। एक समय था जब पीले बैकग्राउंड पर काले अक्षरों मे लिखे जाने वाले एसटीडी, आईएसडी, पीसीओ बूथ पर लोगों की लाइन लगी रहती थी। जीवन का वो सफर बहुत खूबसूरत और उत्तेजक था। उस दौर में, पीसीओ पर लगे फोन यात्री के लिए बहुत महत्वपूर्ण था। जब भी किसी व्यक्ति को दूसरे शहर में किसी से बात करनी होती थी, तो उसे फोन बूथ ढूंढना होता था। इसके लिए वह एक लंबी कतार में लग जाता था, लेकिन जब उसे फोन मिलता था तो वह बहुत खुश होता था। बढ़ती टेक्नोलॉजी के दौर में मोबाइल फोन हमारी पॉकेटो में क्या आया, पीसीओ का चलन ही बंद हो गया। इसी के साथ अब हम अपनी पॉकेटो से एक रुपए के सिक्के की भी तलाश नहीं करते। वो समय ही और था जब हमारे फोन पर सामने से आवाज आती थी ‘भइया जरा रमेश को बुला दिजीये मैं उनकी बहन हूँ‘ हांलाकि खबर में रमेश नाम सिर्फ काल्पनिक तौर पर बताया जा रहा है। फिर आधा घण्टे के बाद फोन करने के लिये कह कर ‘रमेश’ के घर संदेश भेजा जाता था और वह आकर फोन आने का इन्तजार करता था। पहले के दौर में हमारी जिंदगी में बहुत कुछ था जो अब हमारी सोच से भी दूर हो गया है। सड़कों पर लगे पीले बैकग्राउंड और एसटीडी, आईएसडी, पीसीओ बूथ आज बस यादों का हिस्सा बन गए हैं। अब मोबाइल फोन ने एसटीडी पीसीओ की जगह ले ली है। एक समय था जब हमारे लिए टेलीफोन एक अजीब सी चीज़ थी, वहीं आज यह एक स्वाभाविक और रोजमर्रा में प्रयोग होने वाली आवश्यक चीज बन गई है। पहले के दौर में पीसीओ के अलावा गिने-चुने मकानों में टेलिफोन हुआ करता था और उसमें भी लोकल और एसटीडी कनेक्शन लेने के नियम थे। लोकल कनेक्शन केवल अपने प्रदेश और एसटीडी कनेक्शन देश के सभी प्रदेशों में बात कराते थे। उस समय लोगों में बड़ा लगाव हुआ करता था मोहल्ले में किसी एक के घर में फोन हो तो पूरे मोहल्ले के काम आता था, वहीं सुबह से लेकर शाम तक दर्जनों लोगों के लिये फोन आता था। अधिकांश लोग गाँव, गली-मोहल्ले में लगे किसी एक सक्षम व्यक्ति के घर लगे फोन का नम्बर अपने रिश्तेदारों में बांट देते थे और फिर बात करने के लिये जब रिश्तेदारों का फोन आता था तो उनसे एक-आधा घण्टे का समय लेकर सम्बन्धित को बुलाया जाता था और रिश्तेदार का फोन पकड़ते ही चेहरे पर जो खुशी दिखती उसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता। दुनिया भर में बढ़ती टेक्नोलॉजी ने हमारे रोजगार, जीवन शैली और समाज के ढांचे को पूरी तरह बदल दिया है। पहले फ़ोन बूथ थे, जो हमें दुनिया से जुड़े रहने का मौका देते थे, फिर पीसीओ आये जिनसे हम अपने प्रियजनों से दूर रहकर बात कर सकते थे। लेकिन आज विश्वसनीय इंटरनेट संचार, स्मार्टफोन और आवासीय वाईफ़ाई जैसी तकनीकों के साथ, हम अपनी जेब में एक फोन रखकर जब चाहें जिससे चाहें, कहीं से भी किसी से बात कर सकते हैं। भारत में पीसीओ बूथ के माध्यम से एक समय में भारत में फोन करना आज की तरह आसान नहीं था। ये बूथ शहरों, गांवों और छोटे शहरों में मौजूद थे। लेकिन इनकी महत्ता आज कल फोन से लेकर सोशल मीडिया तक के तेजी से बदलते टेक्नोलॉजी के साथ खत्म होती जा रही है। पहले इन बूथ का उपयोग सबसे ज्यादा शहरों में होता था, जहां घरों में फोन कनेक्शन न होने के कारण लोग इन बूथ में फोन करने जाते थे। ये बूथ आमतौर पर पीसीओ वाले दुकानों में हुआ करते थे। इन बूथों में एक फ़ोन, एक टेबल, एक कुर्सी और एक कैश रजिस्टर होता था। जहां जब भी किसी को फोन करना होता था तो रिसीवर उठाकर उसमें एक सिक्का डालना होता था और नंबर घुमाकर फोन पर बात की जाती थी और जब समय खत्म हो जाता था तो फोन अपने आप कट जाता था। यदि आपकी बात पूरी नहीं हुई होती थी तो दोबारा सिक्का डालकर नंबर घुमा कर बात की जा सकती थी। लेकिन वह एक बहुत खूबसूरत दौड़ था जब पैसे खत्म हो जाते थे लेकिन बातें नहीं। तब अक्सर ऐसा भी होता था फोन कट जाने पर हम जल्दी-जल्दी कहते थे कि तुम अपनी तरफ से फोन कर लो। एस टी डी और पी सी ओ का ये नज़ारा अब भी कुछ लोगों के दिलों में बसा हुआ है। यह एक दौर था जब फोन एक अलग अनुभव था। लोग फोन पर बात करते हुए ज़मीन पर बैठे होते थे और सबसे महत्वपूर्ण बात ये थी कि उनका ध्यान सिर्फ बात करने पर होता था। क्योंकि तब आज की तरह महीने भर का रिचार्ज एक साथ नहीं होता था। इसलिए महत्वपूर्ण बातें जल्दी-जल्दी खत्म करनी होती थी। दूर जाकर, लंबी लाइन में लगकर, पैसे खत्म होने के डर से जल्दी-जल्दी अपनी बात पूरी करना और बीच में अधूरी बात रह जाने पर दूसरा सिक्का डालकर बात करना यह जल्दी-जल्दी सामने वाले को कहना कि तुम अपनी तरफ से फोन करो एक अलग ही आपस में प्यार वाला दौर था। 21वीं सदी में जन्मी जनरेशन के लिए भारत में एसटीडी बूथों की कहानी किसी इतिहास से कम नहीं है। भारत में वास्तव में टेलिकॉम की शुरूआत 19वीं सदी में होने लगी थी, लेकिन 20वीं सदी में कई पड़ावों के बाद बहुत तेज़ रफ्तार की क्रांति 21वीं सदी में देखी गई। लैंडलाइन फोन से जब मोबाइल फोन की तरफ बदलाव हो रहा था, तब टेलिकॉम सेवाओं के सामने बड़ी चुनौती थी। मोबाइल फोन नंबरों को भी 10 अंकों का रखा गया, लेकिन इसमें भारत का आईएसडी कोड शामिल हुआ।

Share Now...