जौनपुर धारा,जौनपुर। महात्मा दुख निवारण करने के लिए ही परमात्मा का अवतरण होता है। उक्त उद्गार मानस वेत्ता पं.प्रकाशचन्द्र विद्यार्थी ने तिलकधारी महाविद्यालय के पूर्व प्रबंधक स्व.अशोक कुमार सिंह की चौथी पुण्यतिथि पर ग्राम महरूपुर स्थित मन्दिर पर आयोजित त्रिदिवसीय मानस-प्रवचन को शुभारम्भ करते हुए व्यक्त किया। सीता स्वयंवर प्रसंग का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि राजा जनक की सभा में जब समस्त राजागण शिव-धनुष तोड़ने की बात तो दूर रही, उसे टस से मस तक नहीं कर सके, तो राजा को हृदम व्यथित हो गया। वे सोचने लगे यदि वे अपना प्रण भंग करते हैं तो संसार में उन्हें अपयश का भागी होना पड़ेगा, यदि वे प्रण पर अडिग रहे तो उनकी पुत्री बिन ब्याही रह जायेगी। मिथिलाधिपति जनक क्रोधित होकर ऊँचे स्वर में सभा में उपस्थित राजाओं को फटकार लगाते हुए कहने लगे कि यदि उन्हें पहले ही ज्ञात होता कि यह पृथ्वी वीरों से खाली हो चुकी है। तो वे इस तरह की प्रतिज्ञा नहीं करते। जनक के मुंह से ऐसी बातें सुनकर लक्ष्मण की भौंहे तन गयी। उन्होंने कहा कि रघुवंश शिरोमणि प्रभु राम के रहते हुए जनक को पृथ्वी को वीरों से खाली होने की अनुचित बात नहीं कहनी चाहिए। मुनि विश्वामित्र लक्ष्मण को शान्त कराने का प्रयास करते हैं तो लक्ष्मण कहते हैं कि यदि वे उन्हें आज्ञा दें तो यह लक्ष्मण गेंद की तरह पूरे ब्रह्मांड को उठा लेगा। बाद में मुनिवर उन्हें बैठ जाने की आज्ञा और राम को धनुष तोड़ने की आज्ञा दी। आप परमात्मा के अवतार हैं और जनक जी महात्मा हैं। इसलिए विवाह की इच्छा न रखते हुए भी जनक के दु:खों का निवारण करने के लिए धनुष तोड़ना ही होगा। कथा-वाचक ने पूर्व में पुष्प वाटिका प्रसंग का चित्रण करते हुए श्रृंगार रस की अनुपम छटा बिखेरी। उक्त अवसर पर डॉ.आर.एन.त्रिपाठी, डॉ.समरबहादुर सिंह, पूर्व प्रमुख सुरेन्द्र प्रताप सिंह, डॉ.सूर्यप्रकाश सिंह’मुन्नाÓ, डॉ.अशोक रघुवंशी, प्रबंध समिति के अध्यक्ष श्रीप्रकाश सिंह, प्रबंधक सत्यप्रकाश सिंह ‘माला व पूर्व सांसद के.पी.सिंह सहित आदि उपास्थित रहे।
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दुख:निवारण करने के लिए ही परमात्मा का अवतरण होता है : पंडित प्रकाशचंद विद्यार्थी

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