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सोनभद्र कनहर सिंचाई परियोजना: 27 करोड़ का प्रोजेक्ट 46 साल बाद 3700 करोड़ में हुआ पूरा

सोनभद्र. 46 साल पहले सोनभद्र के आदिवासी इलाके में एक बड़ी सिंचाई परियोजना की नींव पड़ी थी, जिसकी कुल लागत 27 करोड़ रुपये थी. लेकिन सरकारी कुचक्र और सिस्टम की संवेदनहीनता ने पूरी परियोजना को इस तरह अपनी जकड़ में लिया कि कुछ वर्षों में पूरी होने वाली परियोजना बेदम हो गई. घिसट-घिसट कर अब यह परियोजना अपने मुकाम पर पहुंची है. इस बीच इसकी लागत 27 करोड़ से बढ़कर 3700 करोड़ रुपये पहुंच गई.

झारखंड और छत्तीसगढ़ सीमा से सट्टे सोनभद्र के कनहर नदी पर 46 वर्षों से बन रहे कनहर सिंचाई परियोजना का प्रमुख बांध बनकर तैयार हो गया है. इस साल मॉनसून सीजन में बरसात का पानी बांध में रुक जाएगा, लेकिन बांध की वजह से विस्थापित हो रहे लोगों की समस्या बढ़ती जा रही हैं. जिन लोगों को  मुआवजा मिल चुका है वह तो अपना मकान बना रहे हैं, लेकिन जो मुआवजे से वंचित हैं, वह अपनी पुश्तैनी जमीनों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है. प्रशासन 10 दिनों के अंदर डूब क्षेत्र खाली करने को कह रहा है. नहीं हटने पर बुलडोजर लगाकर मकान गिरा देने की चेतावनी दी गई है.

कनहर बांध के कारण विस्थापन की त्रासदी की मार झेल रहे लोगों की उम्मीद अब टूटती जा रही है. जिन्हें मुआवजा मिल चुका है वह तो अपना मकान बनाने में जुट गए हैं, लेकिन जिन्हें नहीं मिला है वह आज भी आस लगाए हुए हैं. चिंता की बात यह है कि ऐसे लोगों की संख्या सैकड़ों में है. कनहर बांध से सबसे पहले डूबने वाले सुंदरी गांव जाने के बाद हर तरफ टूटे हुए मकान नजर आते हैं. डूबने के भय से पूर्वजों के खून पसीने से संवारा आशियाना अपने हाथों से ही खुद उजाड़ रहे हैं. सुंदरी गांव के ही 65 वर्षीय भुलई राम अपने 24 परिवार के सदस्यों के साथ 8 बीघा जमीन पर खेती करके अपने परिवार का भरण पोषण करते हैं. उन्हें 1976 में जब परियोजना की आधारशिला रखी गई तो 1982 में उन्हें जमीन का मुआवजा भी मिला, लेकिन इस बार उनका नाम आवासीय मुआवजा की लिस्ट से बाहर कर दिया गया है. अब उन्हें बिना मुआवजा के ही घर छोड़ने को कहा जा रहा है.

सुंदरी गांव के ही 48 वर्षीय कुरैशा खातुन एक पैर से विकलांग है. पति की मृत्यु 5 साल पहले हो चुकी है. मुआवजा की लिस्ट में इनके देवर का तो नाम है, लेकिन इनका नाम नहीं है. कुरैशा खातून अपनी तीन बच्चों के साथ 4 बीघा जमीन पर खेती बारी करके अपना पेट पाल रही थी. महिला होने के कारण मुआवजे की लिस्ट में इनका नाम नहीं है. अपनी आपबीती बताते हुए वह रोने लगती हैं. वे कहती हैं, ‘ हम क्या जानेंगे साहब? कैसे नहीं मिला? बाप-दादा से लेकर हम यही हैं. डीएम, एसडीएम, लेखपाल और तहसीलदार सब के पास गए. हम तीनों बच्चा लेकर कहां जाएं, कुछ समझ में नहीं आ रहा है. पानी चढ़ने वाला है. कनहर डूब जाएगा. हम विकलांग भी हैं और विधवा भी. हमारा कोई सहारा नहीं है. हम कहां जाएं?

सट्टा भिसुर गांव की मन बसिया की कहानी भी कुरैशा खातून की तरह ही है. 60 वर्षीय मन बसिया अपने पिता की इकलौती संतान थी. भिसुर गांव में इनके पिता की करीब 8 बीघा जमीन और कच्चा मकान है. शादी के बाद मन बसिया भी तीन पुत्रों और चार पुत्रियों के साथ पिता की संपत्ति पर ही 50 साल से यहां रहती आ रही है. लेकिन मुआवजे की लिस्ट में इनका भी नाम सिर्फ महिला होने की वजह से नहीं है. प्रशासन के बुलडोजर ने इनके मकान को गिराते हुए 10 दिनों के अंदर गांव छोड़ने की चेतावनी दी है. 1976 कनहर सिंचाई परियोजना की कहानी भी तमाम विसंगतियों से भरी हुई. 27 करोड़ की परियोजना आज 3000 करोड़ को पार कर चुकी है. 3 बार इस परियोजना का शिलान्यास हुआ, लेकिन विस्थापितों के संबंध में किसी सरकार ने ठोस निर्णय नहीं लिया. जिसके कारण आज तमाम विस्थापित लोग मुआवजे से वंचित हैं. सरकारी आंकड़ों के अनुसार 401, जबकि इसके विपरीत विस्थापित लोगों का कहना है कि चयनित सूची के अलावा भी कुल 3125 परिवार मुआवजा की आस लगाए हुए हैं.जबकि सरकार कहती है कि केवल चयनित सूची में शामिल लोगों को ही मुआवजा दिया जाएगा. उप जिलाधिकारी, दुद्धी श्याम प्रताप सिंह ने बताया कि विस्थापन की प्रक्रिया चल रही है. पहले 3800 की लिस्ट बनी थी. उसके बाद एक रैपिड सर्वे के बाद लिस्ट बनी, उसमें सभी लोगों को मुआवजा दिया गया है. लेकिन हमारी प्रायरिटी यह है कि इस साल डैम कंप्लीट हो जाएगा तो पानी भरेगा. पहली प्रायरिटी हमारी यह है कि वाटर लेवल जहां तक भरेगा, पहले उन गांवों को खाली कराया जाए. उनको प्रायरिटी में मुआवजा दिया जाए. लिस्ट में जो भी लोग हैं उसे पैसा मिला है.