जौनपुर। सिकरारा ब्लॉक अंतर्गत बभनौली ग्रामसभा से प्रशासनिक विफलता का मामला सामने आया है, जहां लोकतंत्र की बुनियादी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा कर दिया गया। यहाँ एक-दो नहीं, बल्कि सैकड़ों की संख्या में जीवित ग्रामीणों को सरकारी दस्तावेजों में ‘मृतÓ घोषित कर दिया गया है। शुक्रवार को बभनौली गाँव के प्राथमिक विद्यालय परिसर में एक अजीबोगरीब मंजर देखने को मिला। दर्जनों ग्रामीण अपने हाथों में ‘डीएम साहब जौनपुर, अभी मैं जिंदा हूँÓ लिखी हुई तख्तियां लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। इन लोगों का गुनाह सिर्फ इतना है कि ये जीवित हैं, लेकिन चुनाव आयोग की मतदाता सूची में इन्हें ‘स्वर्गवासीÓ मान लिया गया है। मामला मतदाता सूची के पुनरीक्षण कार्य से जुड़ा है। ग्रामीणों का आरोप है कि स्थानीय बीएलओ (बूथ लेवल ऑफिसर) संदीप यादव ने घोर लापरवाही और मनमानी बरतते हुए गाँव के करीब 300 से 400मतदाताओं के नाम सूची से काट दिए हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से अधिकांश लोगों के नाम के आगे ‘मृतकÓ दर्ज कर दिया गया है। जब नई मतदाता सूची सामने आई, तो गाँव में हड़कंप मच गया। लोग यह देखकर दंग रह गए कि जो व्यक्ति कल तक उनके साथ बैठकर चाय पी रहा था, कागजों में उसका अस्तित्व खत्म कर दिया गया है। प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे अनिल कुमार शुक्ला ने अत्यंत गंभीर आरोप लगाए हैं। ‘मेरी पत्नी प्रीति शुक्ला जीवित हैं, लेकिन उन्हें मृतक दिखाकर सूची से बाहर कर दिया गया। जब मैंने बीएलओ संदीप यादव को फोन किया और इस गलती का कारण पूछा, तो उन्होंने सुधार करने के बजाय मुझे धमकाया। उन्होंने कहा कि ज्यादा नेतागिरी मत करो, वरना तुम्हें भी कागजों में मारकर तुम्हारा नाम भी काट दूँगा। ‘वहीं, विपिन कुमार उपाध्याय का कहना है कि उनके पूरे खानदान का नाम एक झटके में साफ कर दिया गया है। गाँव के बुजुर्गों, युवाओं और महिलाओं का आरोप है कि बीएलओ ने कभी घर-घर जाकर सर्वे किया ही नहीं। दूसरी ओर, आरोपों के घेरे में आए बीएलओ संदीप यादव का कहना है कि उन्होंने नियमानुसार काम किया है। उनके मुताबिक। उन्होंने कुल 241 लोगों की एक सूची तैयार की थी, जिनमें मृतक और वे महिलाएं शामिल हैं जिनकी शादी हो चुकी है और वे गाँव छोड़ चुकी हैं। उनका दावा है कि वे हर घर गए थे और सर्वे के दौरान उन्होंने मोबाइल से तस्वीरें भी खींची थीं। हालाँकि, बीएलओ का यह तर्क गले नहीं उतर रहा है। सवाल यह उठता है कि अगर उन्होंने घर-घर जाकर वेरिफिकेशन किया, तो सैकड़ों जीवित लोग सामने आकर विरोध क्यों कर रहे हैं? ग्रामीणों का कहना है कि वे इस धांधली की शिकायत लेकर कई बार ब्लॉक मुख्यालय और संबंधित अधिकारियों के चक्कर काट चुके हैं। पीड़ितों के अनुसार, बीडीओ इस संवेदनशील मामले को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। मौके पर पुलिस प्रशासन पहुँचा जरूर, लेकिन ग्रामीणों को ठोस कार्रवाई के बजाय केवल आश्वासन का झुनझुना थमा दिया गया। न्याय न मिलने से आहत बभनौली के ग्रामीणों ने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। ग्रामीणों ने जिलाधिकारी को चेतावनी देते हुए कहा। अगर हमें कागजों पर वापस जीवित नहीं किया गया और हमारा मताधिकार बहाल नहीं हुआ, तो हम सभी जौनपुर कलेक्ट्रेट का घेराव करेंगे। हम जिलाधिकारी कार्यालय के सामने कफन ओढ़कर लेट जाएंगे। जब प्रशासन ने हमें मार ही दिया है, तो हमारी अर्थी उठाने का इंतजाम भी वही करे।यह मामला केवल एक क्लर्क की गलती नहीं लगता। इतनी बड़ी संख्या में नाम काटना और वह भी जीवित लोगों को मृत दिखाकर, कई संदेह पैदा करता है। साजिश की बू: क्या किसी विशेष उद्देश्य के तहत एक बड़ी आबादी को मतदान से वंचित करने की कोशिश की जा रही है।जांच का अभाव बीएलओ की रिपोर्ट को उच्च अधिकारियों ने बिना क्रॉस-चेक किए कैसे स्वीकार कर लिया। डिजिटल इंडिया की हकीकत जहाँ सरकार हर चीज को डिजिटल करने का दावा कर रही है, वहाँ जीवित व्यक्ति को अपनी सांसों का प्रमाण देने के लिए तख्तियां लेकर घूमना पड़ रहा है। लोकतंत्र में वोट की ताकत सबसे बड़ी होती है। यदि जौनपुर का प्रशासन इन ‘जीवित मृतकोंÓ को समय रहते इंसाफ नहीं देता, तो यह आने वाले चुनावों की निष्पक्षता पर एक काला धब्बा होगा।
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ध्वनि प्रदूषण आज एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बन चुका है। जौनपुर जैसे शहरों में ट्रैफिक, लाउडस्पीकर और अनियंत्रित शोर लोगों की मानसिक शांति और स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डाल रहे हैं।
जीवित ग्रामीणों ने हाथ में तख्ती लेकर कहा ‘साहब, अभी हम जिंदा हैं’

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