जौनपुर। जिले में सेवा और जन-कल्याण के नाम पर संचालित कुछ निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली अब जांच के घेरे में आती दिख रही है। आरोप है कि ‘नो प्रॉफिट-नो लॉसÓ (न लाभ-न हानि) के सिद्धांत पर चलने वाले इन ट्रस्ट आधारित अस्पतालों ने सेवा को व्यापार बना लिया है और बीते वर्षों में करोड़ों की अकूत संपत्ति खड़ी कर ली है।
नियमत: ट्रस्ट या सोसाइटी के माध्यम से चलने वाले संस्थानों का मुख्य उद्देश्य सामाजिक सेवा होता है, जहां आय का उपयोग निजी लाभ के बजाय जनकल्याण में होना चाहिए। लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप है कि इन अस्पतालों में ओपीडी पर्चा तक ट्रस्ट के नाम पर नहीं काटा जाता। सामान्य ओपीडी के लिए 300 रुपये और इमरजेंसी के लिए 1000 रुपये तक वसूले जा रहे हैं, जो किसी भी मध्यमवर्गीय या गरीब मरीज की जेब पर भारी पड़ रहे हैं।
- सैकड़ों एकड़ जमीन और संपत्तियों का विस्तार
सूत्रों का दावा है कि चैरिटेबल ट्रस्ट की आड़ में इन संस्थानों ने न केवल अस्पताल चलाया, बल्कि सैकड़ों एकड़ जमीन और भारी-भरकम संपत्तियां भी अर्जित कर ली हैं। इतना ही नहीं, अस्पताल परिसरों में अब विद्यालय, हॉस्टल और अन्य व्यावसायिक गतिविधियां भी धड़ल्ले से संचालित की जा रही हैं। आरोप यह भी है कि ट्रस्ट की आय को समाज सेवा में लगाने के बजाय निजी संपत्ति विस्तार में खपाया जा रहा है।
- ‘नियमों की आड़ में निजी साम्राज्य! ‘
‘विशेषज्ञों का कहना है कि नियमानुसार अस्पताल और विद्यालय दोनों ही ट्रस्ट या सोसायटी के माध्यम से चलाए जा सकते हैं। लेकिन आरोप यह है कि अस्पताल से होने वाली ‘अवैधÓ और भारी-भरकम आय को शिक्षा के नाम पर दूसरे ट्रस्टों या निजी संपत्तियों में ‘डायवर्टÓ किया जा रहा है। सेवा के नाम पर मिलने वाली टैक्स छूट और सरकारी रियायतों का लाभ उठाकर एक ही परिसर में अस्पताल, हॉस्टल और व्यावसायिक स्कूल खोलना नियमों की व्याख्या का उल्लंघन है, जिसकी सूक्ष्म जांच होनी आवश्यक है।



