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Homeअपना जौनपुरशिक्षा का 'बाज़ारीकरण’ : स्कूलों में चल रही अपनी 'समानांतर सत्ता’

शिक्षा का ‘बाज़ारीकरण’ : स्कूलों में चल रही अपनी ‘समानांतर सत्ता’

  • निजी स्कूलों में एनसीईआरटी किताबों की अनदेखी
  • अभिभावकों की जेब पर भारी पड़ रही ‘स्कूलों की मनमानी’

जौनपुर। जिले में शिक्षा का अधिकार अब धीरे-धीरे ‘महंगी शिक्षा का अधिकारÓ बनता जा रहा है। सीबीएसई से संबद्ध निजी स्कूलों ने अपनी मनमानी से अभिभावकों की कमर तोड़ दी है। न नियमों का खौफ है, न प्रशासन का अंकुश। जिले के अधिकांश नामचीन स्कूल अब विद्या का मंदिर कम और व्यावसायिक शोरूम ज्यादा नजर आते हैं। नियमों के मुताबिक, कक्षा 9 से 12 तक एनसीईआरटी पूरी तरह अनिवार्य है और कक्षा 1 से 8 तक भी इसे प्राथमिकता देनी है। लेकिन जौनपुर के निजी स्कूलों में हकीकत इसके उलट है।

मिली जानकारी के अनुसार जो एनसीईआरटी की किताब 60-70 रूपये में मिलती है, उसी विषय की निजी प्रकाशक की किताब 400-500 रूपये में बेची जा रही है। सूत्रों की मानें तो स्कूल संचालकों को निजी पब्लिशर्स से 40′ से 50′ तक का मोटा कमीशन मिलता है। यही कारण है कि स्कूल एनसीईआरटी की किताबों को ‘घटियाÓ या ‘आउटडेटेडÓ बताकर अभिभावकों को निजी पब्लिशर्स का भारी-भरकम बंडल लेने पर मजबूर करते हैं।

री-एडमिशन’ के नाम पर अवैध वसूली

स्कूलों की सबसे बड़ी लूट ‘री-एडमिशनÓ के नाम पर हो रही है। कायदे से जो छात्र पिछले कई वर्षों से उसी स्कूल में पढ़ रहा है, उससे हर साल एडमिशन फीस लेना गैर-कानूनी है। अभिभावकों का कहना है कि हर नई कक्षा में जाते ही उनसे दोबारा नामांकन शुल्क और विकास शुल्क वसूला जाता है। विरोध करने पर बच्चे का नाम काटने या उसे प्रताड़ित करने की धमकी दी जाती है।

स्कूल ही बन गए हैं ‘किताब-कॉपी की दुकान’

सुप्रीम कोर्ट और शिक्षा विभाग के स्पष्ट निर्देश हैं कि कोई भी स्कूल कैंपस के भीतर से किताबें या यूनिफॉर्म नहीं बेचेगा और न ही किसी खास दुकान से खरीदने का दबाव बनाएगा। लेकिन जौनपुर में स्कूलों ने परिसर के भीतर ही काउंटर खोल दिए हैं या शहर की किसी एक दुकान से ‘सेटिंग’ कर ली है। कस्टमाइज्ड कॉपियाँ यहाँ तक कि कॉपियों पर स्कूल का लोगो छपवा दिया जाता है ताकि अभिभावक उसे बाहर किसी स्टेशनरी की दुकान से सस्ते में न खरीद सकें। इससे अभिभावकों के पास कोई विकल्प ही नहीं बचता।

यूनिफॉर्म’ और ‘एक्स्ट्रा एक्टिविटी’ के नाम पर जेब ढीली

किताबों के अलावा, हर दो-तीन साल में स्कूल अपनी यूनिफॉर्म (वर्दी) का डिजाइन या रंग बदल देते हैं ताकि पुराना ड्रेस किसी काम न आए और अभिभावकों को नया सेट खरीदना पड़े। इसके साथ ही, कंप्यूटर फीस, स्मार्ट क्लास फीस और स्पोर्ट्स फीस के नाम पर हर महीने अतिरिक्त वसूली की जाती है।

क्या है नियम और अनिवार्यता?

  • सीबीएसई के नवीनतम दिशा-निर्देशों और उत्तर प्रदेश सरकार के सख्त आदेशों के अनुसार
  • कक्षा 9 से 12 तक : इन कक्षाओं के लिए एनसीईआरटी की किताबें पूरी तरह अनिवार्य कर दी गई हैं।
  • कक्षा 1 से 8 तक: बोर्ड ने स्कूलों को एनसीईआरटी/एससीईआरटी की किताबों का उपयोग करने की सख्त सलाह दी है।
  • निजी प्रकाशक: स्कूल केवल उन विषयों के लिए निजी प्रकाशकों की किताबों का सहारा ले सकते हैं जिनके लिए एनसीईआरटी की पुस्तकें उपलब्ध नहीं हैं, वह भी बिना किसी आपत्तिजनक सामग्री के।
  • महंगे बुक-सेट: जहाँ एनसीईआरटी का पूरा सेट 800 से 1200रूपये में उपलब्ध हो जाता है, वहीं निजी प्रकाशकों की किताबों के साथ यह खर्च 5,000 से 8,000 रूपये तक पहुँच जाता है।
  • कॉपी-किताबों की मोनोपॉली: स्कूल प्रबंधन अभिभावकों को किसी विशेष दुकान या स्कूल कैंपस के अंदर से ही किताबें और कस्टमाइज्ड कॉपियां खरीदने के लिए मजबूर करते हैं।बाजार से किताबें गायब: कई बार यह भी देखा गया है कि बाजार में एनसीआरटी की किताबों की कृत्रिम कमी दिखाकर अभिभावकों को निजी पब्लिशर्स की महंगी किताबें खरीदने पर विवश किया जाता है।
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