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Homeअपना जौनपुररोडवेज बसों के दुरूस्तीकरण की जिम्मेदारी महज खानापूर्ति

रोडवेज बसों के दुरूस्तीकरण की जिम्मेदारी महज खानापूर्ति

बस में लगा गंदगी का अम्बार
  • विभागीय अधिकारी घपलेबाजी कर लगा रहे राजस्व को लाखों का चूना
  • वर्कशॉप गेट के प्राईवेट कर्मचारियों पर बनाया जाता है अनैतिक दबाव

जौनपुर धारा, जौनपुर। उत्तर प्रदेश परिवहन विभाग बसों के संचालन के लिये तमाम प्रयास कर रही है, लेकिन जिन बसों के दुरूस्तीकरण की जिम्मेदारी है वे महज खानापूर्ति कर कार्यालय परिसर में मौज करते नजर आतें हैं तथा वर्कशॉप गेट पर तैनात प्राईवेट कर्मचारियों पर अनैतिक कार्यों का दबाव बनातें है। वहीं यह भी बताया जा रहा है कि कई प्रकार से घपले बाजी कर प्रति माह लाखों की हेराफेरी की जा रही है। वैसे तो जौनपुर डिपो में विभागीय अधिकारियों का निरीक्षण लगभग प्रतिमाह होता रहता है और तमाम खामियां भी पाई जाती हैं लेकिन उच्चाधिकारियों के निरीक्षण व डांट फटकार का भी जिम्मेदारों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। पूर्व में क्षेत्रीय प्रबन्धक गौरव वर्मा द्वारा निरीक्षण के दौरान सीनियर फोरमैन को खामियां पाये जाने पर अन्तिम चेतावनी देते हुए कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था। कुछ दिन तो मामला ठीक-ठाक चला लेकिन मामला शान्त होते ही फिर से बसों के प्रति घोर लापरवाही का नजारा साफ तौर पर देखा जा रहा है। खटारा बसों की संख्या कम होने का नाम ही नहीं ले रही हंै। रोडवेज की हर दूसरी बसों में कुछ न कुछ कमियां तो हैं, लेकिन कुछ बसें तो ऐसी है कि जिसमें कमियों का अम्बार लगा हुआ है। जौनपुर डिपो की बात की जाये तो रोज किसी न किसी बस की छोटी-बड़ी शिकायतें मिलती रहती हैं लेकिन अफसोस इस बात का है कि जिन बसों की शिकायत मिलती है विभाग के उच्चाधिकारी उन्ही बसों के दुरूस्तीकरण पर पूरा ध्यान लगा देतें है और बाकी बसें अपनी ही अवस्था में संचालित हो रही है। हैरानी की बात तो यह है कि तमाम निरीक्षणों व दिशा निर्देशों के बाद भी समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं। अगर गहनता से जाँच की जाये तो मालूम होगा कि प्रति माह जौनपुर डिपो में बसों की धुलाई के नाम पर पच्चीस से तीस हजार का घोटाला हो रहा है। वर्कशॉप ने इसके अलावा और भी कई संसाधन धनोपार्जन के लिये बना रखा है। असुविधाओं के साथ ही चालक व परिचालक की भी यात्रियों से नोक-झोंक होती रहती है। परिचालकों की मानें तो उनकी मजबूरी है बसों को लेकर चलना क्योंकि किलोमीटर से ही उनकी पगार बनती है। वहीं कई बसों में खिड़की में लगे सभी काँचों को खोलने व बन्द करने का संसाधन नदारत रहता है और साथ ही फर्स्ट एड, फायर नियंत्रण यंत्र सम्बन्धित सामग्री भी मौजूद नहीं रहती। बसों में सवारी कर रहे यात्रियों और परिचालकों में आये दिन नोक-झोंक होती रहती है। वहीं विगत दिनों जौनपुर डिपो की एक बस ऐसी भी पायी गयी जो कि सड़कों पर चल तो रही थी लेकिन गेट टूटकर सीढ़ी पर रखा था। बस के अन्दर गंदगी का अम्बार लगा हुआ था। यात्रियों को तो अपनी मंजिल तय करना है तो वे विभाग को कोसते हुए यात्रा करने पर मजबूर हैं। अब इन बसों में सवारी कर रहे यात्रियों से भला परिचालकों की नोक-झोक होना तो आम बात हो गयी है। वहीं डिपो के सीनियर फोरमैन को इस बात की कोई परवाह नहीं कि यात्रियों को क्या परेशानियां उठानी पड़ती हैं उन्हें तो सिर्फ अपने काम से और दाम से मतलब है।

टूट कर सीढी पर रखा मेन गेट का दरवाजा
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