जौनपुर। दुनिया में जितने भी धर्म हैं उसमें सनातन ही मात्र एक ऐसा धर्म है जिसमें स्वयं परमात्मा किसी के पुत्र बन सकते हैं। बाल रूप में वह एक सामान्य बच्चे की तरह रो सकते हैं। ऐसा करके वह भक्त को सुख प्रदान करते हैं। माता कौशल्या की विनती भगवान से बाल रूप में पाने और शिशु लीला का सुख प्रदान करने की थी तो भक्त को वह सुख प्रदान करने के लिए वह उनके पुत्र बने। भक्त की कामना के अनुसार ही वह किसी के भाई बने किसी के पति बने किसी के शिष्य बने। अन्य मतों में परमात्मा निराकार है लेकिन सनातन में ईश्वर भक्त को हर उस रूप में मिलता है जैसी भक्त की कामना होती है। सम्बन्धों का भी एक सुख होता है। मनुष्य रूप में ही नहीं सनातन में परमात्मा अन्य जीवों के रूप में प्रकट हुए हैं। उन्होंने कहा कि यह तेरा है और यह मेरा है यही भटकाव है।सारा भटकाव अविधा के कारण है।आत्म ज्ञान से मनुष्य का भटकाव स्वयं दूर हो जाता है।वेद वाक्य इसमें मदद करते हैं और गुरु इसके लिए माध्यम बनते हैं। जैसे एक ही मिठास से नाना प्रकार की अलग-अलग रंग की मिठाईयां तैयार होने पर बालक अलग-अलग मिठाई को अच्छा बताने लगते हैं ऐसे ही अज्ञानता के चलते हम भी भगवान के अलग-अलग स्वरूपों को अलग-अलग समझ कर उलझ जाते हैं। जैसे सोने के अलग-अलग आभूषणों में सोना ही मूल तत्व है ऐसे ही सभी जीवों में मूल तत्व ब्रह्म ही है।बस माया से परे जाने की जरूरत है।जीव और ब्रह्म को लेकर सारा संशय अज्ञानता के कारण ही है। अज्ञानता के दूर होने से सारा भटकाव दूर हो जायेगा। ये बातें अनंत श्री विभूषित काशी धर्म पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी नारायणान्द तीर्थ जी महाराज ने विकास खंड मछलीशहर के गांव बामी में चल रही राम कथा के चौथे दिन बुधवार की शाम को कथा श्रवण के लिए पंडाल में पधारे श्रोताओं से कही।कथा समापन पर महराज जी की आरती की गई जिसमें बामी तथा आस- पास के कई गांवों के भक्त मौजूद रहे।
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सनातन में परमात्मा बच्चे के रूप में रोतें है : स्वामी नारायणान्द तीर्थ

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