- शाही पुल की छांव में ‘नर्क’ झाड़-झंखाड़ और नशेड़ियों का हुआ कब्जा
- सुंदरीकरण के बजट पर ‘भ्रष्टाचार’ का ग्रहण, जिम्मेदार अधिकारियों ने साधी चुप्पी
जौनपुर। ऐतिहासिक शाही पुल और आदि गंगा गोमती के तट को संवारने के लिए प्रशासन ने जो ‘रिवर फ्रंटÓ का सपना शहरवासियों को दिखाया था, वह अब एक बुरे सपने में तब्दील हो रहा है। करोड़ों रुपये के बजट को गोमती की लहरों में ‘स्वाहा’ करने के बाद अब यह प्रोजेक्ट केवल सरकारी फाइलों में चमक रहा है, जबकि धरातल पर यहाँ केवल गंदगी और असुरक्षा का बोलबाला है।

शाम ढलते ही रिवर फ्रंट का दूसरा छोर किसी डरावने खंडहर जैसा नजर आने लगता है। एक घाट को छोड़कर रोशनी के अभाव में यह स्थान अब नशेड़ियों की शरणस्थली और असामाजिक तत्वों का सुरक्षित अड्डा बन गया है। आलम यह है कि जिस स्थान को परिवार के साथ टहलने के लिए बनाया गया था, वहाँ अब सभ्य नागरिकों का कदम रखना भी दूभर हो गया है। रिवर फ्रंट के किनारे लगाए गए सजावटी पौधे और घास अब विशाल झाड़ियों का रूप ले चुके हैं। रखरखाव के नाम पर एक ढेला खर्च नहीं किया जा रहा है। सुंदरीकरण के लिए बनाई गई टाइल्स उखड़ रही हैं। करोड़ों खर्च करने के बाद भी गोमती का यह किनारा आज अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा है।

पिकनिक स्पॉट बना ‘अश्लीलता’ का केंद्र
स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि उचित निगरानी और सुरक्षा गार्ड न होने के कारण दिन के उजाले में यहाँ प्रेमी जोड़ों का जमावड़ा लगा रहता है, जिससे राहगीरों को शर्मिंदगी झेलनी पड़ती है। प्रशासन ने इसे पर्यटन स्थल बनाने का दावा किया था, लेकिन आज यह ‘अवैध गतिविधियोंÓ का हॉटस्पॉट बन चुका है।
जनता का सवाल: कहाँ गया बजट?
शहर के प्रबुद्ध वर्ग का कहना है कि यह जनता के टैक्स के पैसे की खुली बर्बादी है। अगर रखरखाव ही नहीं करना था, तो करोड़ों रुपये क्यों फूंके गए? जौनपुर की जनता अब जवाब चाहती है कि इस ‘सफेद हाथी’ की सुध कब ली जाएगी या फिर इसे ऐसे ही अपराधियों के हवाले छोड़ दिया जाएगा?
- बजट और निर्माण : यह सच है कि जौनपुर में गोमती नदी के तटों, विशेषकर बजरंग घाट से सद्भावना पुल तक के सुंदरीकरण और रिवरफ्रंट की तर्ज पर विकास के लिए करोड़ों का बजट स्वीकृत हुआ था और काम भी शुरू हुआ। लेकिन वर्तमान में निर्माण की गुणवत्ता और रखरखाव पर बड़े सवाल उठ रहे हैं।
- बदहाली और अंधेरा : स्थानीय रिपोर्टों और जन-शिकायतों के अनुसार, रिवरफ्रंट के कई हिस्सों में लगाई गई लाइटें और कुर्सियां अब या तो क्षतिग्रस्त हैं या चोरी हो चुकी हैं। प्रशासन द्वारा नियमित निगरानी न होने के कारण शाम के बाद वहां असामाजिक तत्वों और नशेड़ियों का जमावड़ा होने की खबरें अक्सर स्थानीय चर्चाओं और सोशल मीडिया का हिस्सा बनती हैं।
- सफेद हाथी : किसी भी प्रोजेक्ट को ‘सफेद हाथी’ तब कहा जाता है जब उस पर खर्च तो भारी हो लेकिन जनता को उसका लाभ न मिले। रिवरफ्रंट पर झाड़-झंखाड़ उगना और टाइल्स का उखड़ना शासन की अनदेखी का पुख्ता सबूत है।



