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Homeअपना जौनपुरबच्चों को भी लायें सत्संग में : पंकज महाराज

बच्चों को भी लायें सत्संग में : पंकज महाराज

खुटहन। बुधवार को संत पंकज महाराज 119वें पड़ाव पर सत्संग सम्बोधन में महात्मा कबीर दास की वाणी ‘पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई अक्षर प्रेम का पढ़ै सो पंडित होय। को उद्धृत करते हुये कहा अरे प्रेमियों! ढाई अक्षर प्रेम नहीं है। प्रेम में तो अक्षर के साथ मात्रा भी लगी है। ढाई अक्षर है श, ब् और द शब्द। इसी शब्द को महात्माओं ने नाम, धुन, आवाज, कलमा या साउण्ड तथा नानक ने अनहदवाणी कहा है। यह ऊपरी मण्डल से अलग-अलग लोक के धनियों के मुखारबिन्द से निकली आवाजें होती हैं जिनको केवल अन्तरी कान से सुना जा सकता है। बाहर के कानों से नहीं। शरीर में दो आंख, दो कान व नाक के दो छिद्र होते हैं और शरीर में दोनों आंखों के मध्य बैठी जीवात्मा में एक कान, एक आंख व दैवीय सुगंध को सूंघने की एक नाक होती है। यह गूढ़ रहस्य जागृत महात्मा ही बता सकते हैं जिन्होंने कलयुग की सरल साधना सुरत शब्द योग मार्ग की साधना कर रखी हो। अपनी आत्मा को जगा लिया हो। ऐसे महात्मा की खोज अवश्य करें। कहावत है कि ‘गुरु करैं जानि कै, पानी पियै छानि कै।Ó उनकी जाति बिरादरी नहीं पूछी जाती कि महात्मा किस जाति के हैं। ‘जाति न पूछो साध की, पूछो उसका ज्ञान।Ó इसलिये प्रेमियों नामदान आपको मिल गया है। यह रास्ता सच्चा है। आप करोगे तो आपको भी अनुभव होगा। संस्थाध्यक्ष ने कहा वर्तमान समय में युवाओं में संस्कारों की कमी देखी जा रही है। संस्कार डिग्री डिप्लोमा लेने से नहीं पड़ते हैं। संस्कार पड़ते हैं महात्माओं की वाणी से, महात्माओं के संसर्ग से। इसलिये आप लोग जब भी सत्संग में आये ंतो अपने-अपने युवा बच्चे-बच्चियों को भी सत्संग में लाया करें।