- कलेक्ट्रेट का शर्मनाक सच, 3.33 लाख का प्याऊ बना शो-पीस
जौनपुर। उत्तर प्रदेश के जौनपुर जनपद का ‘हृदयÓ कहे जाने वाले कलेक्ट्रेट परिसर से आज एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो सूबे की सरकार के ‘स्वच्छ भारत मिशनÓ और ‘स्मार्ट सिटीÓ के दावों की जमीनी हकीकत को पूरी तरह बेनकाब कर रही है। जिस परिसर में जिले के मुखिया जिलाधिकारी और कानून व्यवस्था के रक्षक पुलिस अधीक्षक का कार्यालय स्थित हो, जहाँ हर पल वीआईपी मूवमेंट रहता हो और जहाँ से पूरे जिले के विकास और न्याय की इबारत लिखी जाती हो, उस वीवीआईपी क्षेत्र में आज अव्यवस्था और गंदगी का साम्राज्य फैला है। एसपी ऑफिस के ठीक बगल, जहाँ से हर रोज न्याय की आस में सैकड़ों फरियादी और फर्राटा भरती अधिकारियों की गाड़ियां गुजरती हैं, वहाँ कचरे का एक ऐसा विशाल अंबार लगा है जिसे देखकर किसी का भी सिर शर्म से झुक जाए। कूड़े के इस ढेर से उठने वाली भीषण दुर्गंध न केवल कलेक्ट्रेट की गरिमा को धूमिल कर रही है, बल्कि यहाँ आने वाले लोगों के स्वास्थ्य के साथ भी सरेआम खिलवाड़ किया जा रहा है। यह स्थिति तब है जब इसी परिसर में जिले के सबसे बड़े अधिकारियों का हर वक्त जमावड़ा रहता है। ऐसे में जनता के बीच यह बड़ा सवाल उठना लाजिमी है कि जब जिले की सबसे सुरक्षित और महत्वपूर्ण ‘कलेक्ट्री कचहरीÓ के मुख्य द्वार का यह हाल है, तो शहर की दूर-दराज की गलियों और आम चौराहों पर स्वच्छता की क्या स्थिति होगी। क्या प्रशासन अपनी ही नाक के नीचे फैली इस सड़ांध से पूरी तरह अनजान है या जानबूझकर इन तस्वीरों की अनदेखी की जा रही है?
कचरे के ढेर पर सोता कुत्ता और मूत्रालय की बदहाली
ताजा तस्वीरों ने कलेक्ट्रेट की बदहाली पर मुहर लगा दी है। कचहरी परिसर में खुले में बने मूत्रालय के ठीक सामने गंदगी का ऐसा अंबार लगा है कि वहां खड़ा होना भी दूभर है। तस्वीर में साफ देखा जा सकता है कि कचरे के इस ढेर को ही आवारा पशुओं ने अपना आशियाना बना लिया है। एक कुत्ता गंदगी के उसी ढेर पर सोया हुआ है, जो संक्रमण और बीमारियों को खुला निमंत्रण दे रहा है। पास ही बने मूत्रालय की जर्जर दीवारें और वहां की गंदगी यह बताने के लिए काफी है कि नगर पालिका और सफाई विभाग इस महत्वपूर्ण परिसर के प्रति कितना उदासीन है।

करोड़ों के बजट वाली नगर पालिका का 3.33 लाख का ‘सफेद हाथी’
गंदगी के साथ-साथ परिसर में पानी की समस्या भी विकराल है। नगर पालिका परिषद जौनपुर द्वारा 15वें वित्त आयोग के अंतर्गत 3.33लाख की लागत से एक ‘जल शोधन केंद्र एवं पानी की टंकी’ का निर्माण यहाँ आने वाले वादी-प्रतिवादियों के लिए कराया गया था। इसका उद्घाटन बड़े तामझाम के साथ राज्य मंत्री गिरीश चंद्र यादव और तत्कालीन अध्यक्ष माया टंडन द्वारा किया गया था। लेकिन आज हकीकत यह है कि पत्थर पर लिखे नाम तो चमक रहे हैं, पर उस टंकी से पानी की एक बूंद नहीं टपकती। लाखों रुपए खर्च करने के बाद भी जनता प्यासी है और यह प्याऊ महज एक ‘सफेद हाथीÓ बनकर रह गया है।
आम जनता की परेशानी
दूर-दराज से अपने मामलों की पैरवी करने आए वादी और प्रतिवादी गर्मी और प्यास से बेहाल रहते हैं। कलेक्ट्रेट जैसे संवेदनशील स्थान पर बुनियादी सुविधाओं का इस तरह अभाव होना प्रशासन की संवेदनहीनता को दर्शाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि जब बड़े-बड़े शिलापट्ट लगाकर विकास के दावे किए जाते हैं, तो उनके रखरखाव की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?



