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Jaunpur News : धार्मिक गर्न्थो में श्रीरामचरितमानस है सर्वश्रेष्ठ स्वाती

जौनपुर धारा, जौनपुर। सिकरारा के शेरवा गांव स्थित श्रीहनुमंगढ़ी धाम पर चल रहे। पांच दिवसीय संगीत मय श्रीराम कथा की प्रथम संध्या पर बुधवार को कथा व्यास स्वाती शुक्ला ने श्रद्धालुओं को पावन ग्रन्थ श्रीरामचरित मानस की महानता का वर्णन किया। उन्होने बताया कि गोस्वमी तुलसीदास ने प्रारम्भ में संस्कृत भाषा में श्रीराम कथा को लिखना शुरू किए। जब भी वे कथा लिखते सुबह वह मिट जाती थी। यह क्रम कई दिन चलता रहा। बाद दे कथा की रचना संस्कृत भाषा में न करके सरल भाषा अवधी बोली में किया। जो बहुत लोकप्रिय हुआ। उनकी कृति से ईर्ष्या रखने वाले संस्कृत भाषी इसकी आलोचना करने लगे। गोस्वामी ने उन्हें जवाब देते हुए कहा कि उन्होने किसी ग्रन्थ की रचना नहीं की है बल्कि उनसे लिखवाया गया है। अब इसकी रक्षा व दिगदर्शन वहीं करें। परीक्षा लेने के लिए काशी के विद्वानों व पण्डा पुजारियों ने एक योजना के अनुसार काशी विश्वनाथ मंदिर में सबसे नीचे गोस्वामी जी की रचना को रखते हुए सभी धार्मिक गर्न्थो को ऊपर रखकर मंदिर का कपाट बंद कर दिया। प्रातःकाल जब सब की उपस्थित में मंदिर का कपाट खोल गया तो सभ हतप्रभ रह गए। वह ग्रन्थ जिसे उन लोगों ने सबसे नीचे रख था, वह सबसे ऊपर स्थित था। इतना ही नहीं जब उसे खोला गया। तो उसे प्रथम पृष्ठ पर सत्यम शिवम सुंदर लिखते हुए भोले बाबा का हस्ताक्षर भी अंकित था। सभी व्ाâी आँखे खुली कि खुली रह गईं, सभी ने गोस्वामी से क्षमा याचना की और यह मान लिया कि इस ग्रन्थ को देवाधिदेव ने सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ की मान्यता स्वयं दी है। व्यास ने कथा को आगे बढ़ाते हुए बताया कि गोस्वामी मंगलाचरण में स्वयं स्वीकार किया है कि वे नाना पुराण निगमागम को आधार मानकर स्वान्तः सुखाय ही रघुनाथ की कथा का वर्णन किया है। इसमें उनकी बुद्धि कीकोई विशेषता नहीं है, ग्रन्थ के कथा वाचक व श्रोता अलग-अलग स्थलों पर अलग अलग हैं। तातपर्य यह कि तुलसी बाबा ने महान ऋषि के मुख से ही पूरी कथा कहलवाई और उसके श्रोता भी महान हैं। काशी में उच्चतम स्थान पाने के बाद गोस्वामी कथा कर्म काण्ड को आधार बनाकर प्रयागराज लेकर पहुंचते हैं। यहाँ याज्ञवल्क्य मुनि और भरद्वाज क्रमशः वक्ता व श्रोता रहते हैं। यहां से कैलाश पर्वत पर अवस्थित ज्ञान घाट पर शंकर जी व पार्वती के बीच संवाद होता है। इसके बाद नीलगिरी पर्वत पर कागभुशुण्डि व पक्षीराज गरुण के माध्यम से भक्तिघाट पर  कथा का विस्तार होता है।

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