- नन्हें रोज़ेदारों ने भी अकीदत के साथ रखा पहला रोज़ा
जौनपुर धारा, जौनपुर। जि़ले में रविवार को पवित्र माह रमज़ान के पहले दिन मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में सुबह से ही रोज़ेदारों की चहल पहल दिखाई पड़ी। सूर्योदय से पहले ही लोगों ने अपने अपने घरों में सहरी करने के बाद रोज़ा रखने की नीयत किया और अज़ान के बाद फज्र की नमाज़ अदा किया। मौसम खुशगवार होने की वजह से रोज़ेदारों का पहला दिन काफी अच्छा रहा तो वहीं रमज़ान के पहले दिन रविवार होने के कारण नगर की मस्जिदों में नमाज़ अदा करने वालों की अच्छी खासी भीड़ देखने को मिली। लोगों ने नमाज़ के बाद मुल्क में अमन व शांति एवं खुशहाली के लिए दुआएं मांगी।
इस्लाम धर्म में पहला रोजा संयम और सब्र सिखाता है। सूरज निकलने के कुछ वक्त पहले से सूरज के अस्त होने तक कुछ भी नहीं खाना-पीना यानी निर्जल-निराहार रहना बहुत अहमियत रखता है। ठीक वैसे ही जैसे दुनिया के हर मजहब में उपवास रोजा प्रचलित है। मिसाल के तौर पर सनातन धर्म में नवरात्र के उपवास, जैन धर्म में पर्युषण पर्व के उपवास तथा ईसाई धर्म में फास्टिंग फेस्टिवल जिन्हें फास्टिंग डेज या हॉली फास्टिंग कहा जाता है। अरबी भाषा का सौम या स्याम लफ़्ज ही दरअसल रोजा है। सौम या स्याम का संस्कृत हिन्दी में मतलब होगा संयम। इस तरह अरबी जबान का सौम या स्याम ही हिन्दी व संस्कृत में संयम है, पहला रोजा ईमान की पहल है। सुबह सेहरी करके दिनभर कुछ न खाना-पीना या सोते रहकर शाम को इफ़्तार करने का नाम रोजा नहीं है। यानी रोजा सिर्फ भूख-प्यास पर संयम या कंट्रोल का नाम नहीं है। बल्कि हर किस्म की बुराई पर नियंत्रण/संयम कंट्रोल का नाम है, सेहरी से रोजा आरंभ होता है। नीयत से पुख्ता होता है। इफ़्तार से मुकम्मल होता है। इस्लाम मज़हब में रोज़ा, मज़हब का स्तंभ भी है और रूह का सुकून भी। रोजा रखना हर मुसलमान पर फज़र् है। पवित्र कुरआन में अल्लाह का आदेश है और रोजा रखना तुम्हारे लिए ज्यादा भला है अगर तुम जानो। अल्लाह के इस कथन में जो बात साफ तौर पर नजर आ रही है। वे यही है कि रोजा भलाई का डाकिया है।रोजा ख़ुद ही रखना पड़ता है। अगर ऐसा नहीं होता तो अमीर और मालदार लोग धन खर्च करके किसी गरीब से रोजा रखवा लेते। वैज्ञानिक दृष्टि से रोजा स्वास्थ्य यानी सेहत के लिए मुनासिब है। मज़हबी नजरिए से रोजा रूह की सफाई है। रूहानी नजरिए से रोजा ईमान की गहराई है। सामाजिक नजरिए से रोजा इंसान की अच्छाई है। मगरिब से पहले मस्जिदों में रोज़ा इफ्तार का इंतेज़ाम करते हुए लोग दिखाई दिये और अज़ान की आवाज़ सुनते ही लोगों ने पहला रोजा खोला और नमाज़ अदाकर अल्लाह से दुआएं मांगी। तो वहीं माह-ए-रमज़ान के महीने में बड़ों के साथ-साथ छोटे-छोटे मासूम बच्चे भी रोज़ा रखने में पीछे नहीं हट रहे हैं। नन्ह़ें रोज़ेदार भूखे प्यासे रहकर पहला रोज़ा मुकम्मल किया। बड़ो के साथ बच्चे अल्लाह की इबादत कर रहे हैं। रोज़ा रखने के साथ पांचो वक्त की नमाज़ और कुरआन-ए- पाक की तिलावत कर रहे हैं।



