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Homeअपना जौनपुरहुसैन ने एबा के दामन में समेटा था कासिम की लाश

हुसैन ने एबा के दामन में समेटा था कासिम की लाश

  • जिंदा रहते ही यजीदी फौज ने घोड़ों की टापों से कर दिया था पामाल
  • मुहर्रम की सातवीं तारीख को जगह जगह निकला मेंहदी और दुलदुल का जुलूस

जौनपुर धारा, जौनपुर। अशरये आशूरा के करीब आते ही जिले में मजलिस मातम व जुलूस के साथ साथ शबीहे ताबूत अलम व दुलदुल निकालने का सिलसिला दिन रात रात जारी है। मुहर्रम की सातवीं तारीख को नगर के बलुआघाट स्थित हाजी मोहम्मद अली खां के इमामबाड़े में बुधवार की सुबह मजलिस को खिताब करते हुए मौलाना सैयद आमिर काजमी मुजफ्फरनगर ने कहा कि दसवीं मुहर्रम को बस दो ही दिन बचा है ऐसे में हम लोग जितना हो सके उतना इमाम के गम में मजलिस मातम व नौहा पढ़कर उन्हें नजरानए अकदीत पेश करें। मौलाना ने कहा कि सातवीं मुहर्रम को हजरत इमाम हुसैन अ.स. के भतीजे 14 वर्षीय जनाबे कासिम की शहादत के लिए याद की जाती है यही वजह है कि आज के दिन उनके नाम की मेंहदी का जूलूस निकाला जाता है। कर्बला में जब जंग यजीदी फौजों से हो रही थी तब हजरत इमाम हुसैन अ.स. के बड़े भाई हजरत इमाम हसन के पुत्र हजरत कासिम अ.स. जंग में जाने की इमाम हुसैन से बराबर इजाजत मांग रहे थे मगर इमाम उन्हें अपने भाई की इकलौती निशानी का हवाला देकर रोक देते थे तभी जनाबे कासिम को अपने पिता की वसीयत याद आई कि उन्होंने कहा था कि जब तुम परेशान होना तो अपने बाजू में बंधी हुई तावीज को खोलकर मेरे भाई इमाम हुसैन अ.स. को दे देना तो तुम्हारी मुश्किल हल हो जायेगी। जनाबे कासिम ने खुशी खुशी वो तावीज इमाम हुसैन को दी तो जब इमाम हुसैन ने तावीज खोलकर पढ़ा तो उसमें लिखा था कि मैं कर्बला में तो नहीं रहूंगा पर मेरी तरफ से जनाबे कासिम को जंग में जाने की इजाजत देकर मैदान में भेज दें। हजरत इमाम हुसैन ने जनाबे कासिम को जंग के मैदान में जाने की इजाजत दी जहां उन्होंने हजारो लोगों को फिन्नार किया। यह देखकर सभी यजीदी फौजियों ने उन्हें घेरकर वार करना शुरू कर दिया जिससे वे घोड़े से जमीन पर गिरे और घोड़ों की टापों से उनका जिस्म पामाल हो गया। ये देखकर इमाम हुसैन बहुत रोये क्योंकि एक दिन पूर्व ही जनाबे कासिम की शादी हुई थी। इस दर्दनाक मंजर को सुनकर अजादार दहाड़ मारक र रोने लगे। बाद मजलिस शबीहे ताबूत अलम व दुलदुल का जुलूस निकाला गया। अंजुमन हुसैनिया द्वारा नौहा मातम करते हुए जुलूस नौरोज के मैदान पहुंचा तो वहां गुलामुल सकलैन शजर ने तकरीर किया जिसके बाद अली नजफ के इमामबाड़े से निकले शबीहे ताबूत अलम व दुलदुल को एक दूसरे से मिलाया गया। जुलूस पुन: अपने कदीम रास्तों से होता हुआ हाजी मोहम्मद अली खां के इमामबाड़े में समाप्त हुआ।