हुनरमंद आज भी छोटे-छोटे व्यापार से चला रहे परिवार
जौनपुर धारा, जौनपुर। जौनपुर जिले के दिव्यांग दूसरे व्यक्तियों के लिए उदाहरण स्थापित कर रहें है। कहतें है कि दुनिया में सिर्फ एक ही विकलांगता है और वह है नकारात्मक सोच। इस बात को सच साबित कर न सिर्फ अपने लिए बल्कि दूसरों के लिए भी जौनपुर के कुछ लोग प्रेरणा बन रहे हैं। जिन्होने अपनी शारीरिक अक्षमता को कमजोरी नहीं बनने दिया। जीवन में आत्मविश्वास का धन मौजूद है, कार्य करने की ललक है, मन में उत्साह है तो विकलांगता का निश्चित रूप से कोई भी मूल्य हो ही नहीं सकता। अपनी सामर्थ्य और आत्मविश्वास के बल पर व्यक्ति विकलांगता को आसानी से पराजित कर जीवन में सफलताओं की सीढ़ियां चढ़ सकता है। आज कई क्षेत्रों में लोगों को अपने वर्तमान परिस्थितियों के लिए अपने भाग्य को कोसते हुए देखा जाता हैं। अगर आपको भी ऐसा लगता है कि जिंदगी में कुछ भी ठीक नहीं चल रहे है या फिर आप अपनी जिंदगी के उतार चढ़ाव से थक गए हैं। तो आपकों जौनपुर के उन होनहारों से शिक्षा लेनी चाहिए जो दिन भर कड़ी मेहनत करके खुद का और परिवार का पालन पोषण कर रहें है। वहीं अक्सर यह भी देखने को मिलता है कि हष्ट-पुष्ट लोगों को काम की दरकार है।

जौनपुर के स्टाम्प विक्रेता विकास श्रीवास्तव, पान की दुकान संचालक आनन्द तिवारी और सुबह घर-घर अखबार पहुँचाने वाले मनीष सेठ को देखकर यह कहा जा सकता है कि आपके अंदर कुछ करने की इच्छा है तो दुनिया की कोई ताकत आपको झुका नहीं सकती। जौनपुर में यह देखा जा सकता है कि ये लोग अपनी मेहनत से इस दुनिया को गलत साबित कर रहे हैं। क्योंकि ये दुनिया दिव्यांग लोगों के बारे में यहीं सोचती है कि इनकी जिंदगी दूसरों के भरोसे ही चलनी है। दुनिया का सबसे मुश्किल काम अपने संघर्ष को शक्ति में बदलना होता है। अगर जिसने भी यह काम कर लिया वह अपनी जिंदगी में कामयाब हो जाएगा। हौसलों के आगे विकलांगता कमजोर दिखाई देती है। मेहनत, उत्साह और आत्मविश्वास के द्वारा जीवन में सफलता प्राप्त करने की कहानी को बयां करती है, जनपद के सिरकोनी ब्लॉक अन्तर्गत वंश गोपालपुर के आनन्द तिवारी की। जो विकलांग होते हुए भी किसी तरह विकास भवन के सामने पान की दुकान चलाकर अपना और अपने परिवार का पालन पोषण कर रहें है। आनंद ने बताया कि उनके परिवार में उनकी माँ और एक छोटा भाई है, जिनका खर्च उसी छोटे से पान की दुकान से चल जाता है।

वहीं नगर में सुबह-सुबह घर-घर अखबार पहुँचाने का कार्य नगर के मनीष सेठ करतें है। मिली जानकारी के अनुसा उनका एक छोटा भाई है वह भी विकलांग है। मनीष सुबह अखबार बांटकर अपने रोजी-रोटी का प्रबन्ध करता है। ऐसी ही कहानी लड्डनपुर गाँव के स्टाम्प विक्रेता विकास श्रीवास्तव की है, जो दिन भर कलेक्ट्रेट में स्टाम्प सहित अन्य सरकारी कागजों की बिक्री कर रोजगार की अलख जगाये बैठे हैं। विकास ने बताया कि पिताजी पी.डब्ल्यू.डी. विभाग से रिटायर्ड है। 2011 के बाद वे परमानेन्ट हुए थे इसीलिये उन्हे पेंशन भी नहीं मिलती है और इसी इकलौते व्यापार से उनके घरों की जीविका चल रही है। इन दिव्यांगो को देखकर यह महसूस होता है कि जो लोग हष्ट-पुष्ट होते हुए भी काम की तलाश में दर-दर भटकतें रहतें है। कुछ ऐसे भी है जो मजदूरी करने में सक्षम होते हुए भीख मांगकर गुजारा करने को ही रोजगार मानतें हैं।




