जौनपुर धारा, जौनपुर। शहर से लेकर गांव की यादों में बोरसी की आग का महत्व आज भी याद है। सर्दियों के खिलाफ मोर्चा संभालने में बोरसी की आग का किरदार बिल्कुल कारगर था। नई पीढ़ी ब्लोवर, रूम हिटर आदि की दुनिया में जी रही है। अधिकांश लोगों को मिट्टी से बने कारगर यंत्र बोरसी का नाम भी नहीं मालूम हो। ग्रामीण क्षेत्रों में तो आज भी बोरसी का वहीं महत्व है लेकिन शहरी क्षेत्रों से यह बिल्कुल विलुप्त होता जा रहा है। सर्दियों के खिलाफ अभी कुछ वर्षों पहले तक सबसे कारगर हथियार बोरसी की आग हुआ करती थी, हमारी पीढ़ी को जाड़े की रातों में बोरसी की आग की स्मृतियां भूली नहीं है। घर के दरवाजे पर, दालान में या आंगन में जलती, सुलगती बोरसी का मतलब ही ठण्ड से लड़ने की भरपूर ताकत व संपूर्ण सुरक्षा होता था। अब पक्के मकानों में दीवारें काली पड़ जाने के डर से शायद ही कहीं बोरसी नजर आती होगी। उसकी जगह रूम हीटर या ब्लोअर ने ले ली है। मिट्टी और खपरैल के मकानों में ऐसा कोई डर नहीं होता था। घर के बुजुर्ग कहते थे कि दरवाजे पर बोरसी की आग हो तो ठंढ तो क्या, सांप-बिच्छू और जानवरों का भी घर में प्रवेश बंद हो जाता है। सार्वजनिक जगहों पर जलने वाले अलाव या घूरे जहां गांव-टोले के चौपाल होते थे, बोरसी को पारिवारिक चौपाल का दर्जा हासिल था। घर के कई मसले बोरसी के गिर्द सुलझ जाते थे। बच्चों के लिए बोरसी की आग सेंकने के अलावा उसमें आलू, मटर, पकाकर खाने का रोमांच कुछ अलग ही होता था। किशोरों के रूमानी सपनों को बोरसी की आग ऊष्मा और उड़ान देती थी। बड़े-बूढ़ों के लिए कड़कड़ाती सर्दी में यह आग उनके जीवन-मरण का सवाल हुआ करती थी। बिस्तर पर जाते समय बोरसी को उसकी बची-कुची आग सहित बुजुर्गों या बच्चों के बिस्तरों के पास या उनकी खाट के नीचे रख दिया जाता था। कहना न होगा कि उसकी ऊष्मा के घेरे में नींद बहुत गहरी आती थी। आज के युवाओं और बच्चों के पास बोरसी की यादें नहीं हैं। जिन उम्रदराज लोगों ने कभी उसकी गर्मी और रूमान महसूस किया है उनके पास घरों की डिजाइनर दीवारों और छतों के नीचे बोरसी सुलगाने की आज़ादी अब नहीं रही।
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