जौनपुर। बक्शा क्षेत्र स्थित बढ़ौना गांव में बायोगैस तकनीक का सफल प्रयोग किया जा रहा है। यहां के निवासी अखिलेश कुमार सिंह पिछले कई दशकों से इस तकनीक का उपयोग कर रहे हैं। उनके अनुसार, बायोगैस न केवल रसोई के लिए सुरक्षित ईंधन का विकल्प है, बल्कि खेती के लिए भी एक मूल्यवान खाद का स्रोत है। अखिलेश कुमार सिंह ने बताया कि उनके यहां पहला बायोगैस प्लांट वर्ष 1984 में स्थापित किया गया था। शुरुआती तकनीकी समस्याओं के बाद, अब वे आधुनिक ‘जनता बायोगैसÓ मॉडल का सफलतापूर्वक उपयोग कर रहे हैं। यह तकनीक दोहरा लाभ प्रदान करती है। पशुओं के गोबर के घोल से बनने वाली यह गैस खाना बनाने और चाय बनाने के लिए एक स्वच्छ और सुरक्षित ईंधन है। इसमें दुर्घटना का कोई खतरा नहीं होता। बायोगैस संयंत्र से निकलने वाले अवशेष, जिसे स्लरी कहते हैं, में उच्च उर्वरक शक्ति होती है। यह फसलों की पैदावार बढ़ाने में सहायक सिद्ध होती है, जिससे किसानों को रासायनिक खादों पर निर्भरता कम करने में मदद मिलती है। हालांकि, इस तकनीक के सामने कुछ चुनौतियां भी हैं। अखिलेश सिंह का मानना है कि आज के किसान इसके रखरखाव के प्रति उदासीन हैं। गोबर घोलने और संयंत्र की समय पर सफाई न होने के कारण कई प्लांट बंद हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त, क्षेत्र में बायोगैस तकनीक के प्रशिक्षित कारीगरों की कमी भी एक बड़ी बाधा है, जिससे संयंत्रों की मरम्मत और स्थापना में दिक्कतें आती हैं। स्थानीय किसान अखिलेश कुमार सिंह ने कहा, ‘खेती-बारी में बायोगैस से ज्यादा फायदे की चीज कोई और नहीं है। सरकार को चाहिए कि वह इस दिशा में और अधिक प्रोत्साहन दे।Ó उन्होंने प्रशासन, विशेषकर बीडीओ और जिलाधिकारी से ग्रामीण क्षेत्रों में बायोगैस के प्रति जागरूकता बढ़ाने और किसानों को इस टिकाऊ ऊर्जा स्रोत को अपनाने के लिए प्रेरित करने की अपील की है।
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खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग की जिला स्तरीय समिति की बैठक संपन्न
जौनपुर। जिलाधिकारी डॉ.दिनेश चंद्र की अध्यक्षता में खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग की जिला स्तरीय समिति की बैठक कलेक्ट्रेट सभागार में जिलाधिकारी डॉ.दिनेश...
रसोई ईंधन और खेती के लिए खाद का बेहतरीन स्रोत



