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संघ का वर्ष प्रतिपदा उत्सव व पथ संचलन आयोजित

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भगवान राम द्वारा वन में ताड़का, सुभाहू, आदि राक्षसों के संहार का प्रसंग सुन मंत्रमुग्ध हुए लोग

सिकरारा। खानापट्टी गांव के रामलीला मैदान में आयोजित सात दिवसीय संगीतमय श्रीरामकथा के पांचवें दिन, रविवार को भगवान श्रीराम के गुरुकुल प्रवास और राक्षस संहार के प्रसंग ने श्रोताओं को भक्ति के रंग में डुबो दिया। इस अवसर पर अयोध्याधाम से पधारे प्रख्यात कथावाचक संतोष शरण महाराज ने अपनी मधुर वाणी और गहन भक्ति-भाव से महर्षि विश्वामित्र के राजा दशरथ के दरबार में आगमन और श्रीराम को गुरुकुल ले जाने के प्रसंग को जीवंत कर दिया। कथा के इस मनोहारी प्रसंग में संतोष शरण महाराज ने बताया कि जब महर्षि विश्वामित्र अयोध्या के राजदरबार में पहुंचे, तो उनकी तेजस्वी उपस्थिति से पूरा दरबार गूंज उठा। महर्षि ने राजा दशरथ से अपने यज्ञ की रक्षा के लिए श्रीराम और लक्ष्मण को उनके साथ वन में भेजने का अनुरोध किया। राजा दशरथ, जो अपने पुत्रों से असीम स्नेह रखते थे, पहले तो इस अनुरोध से विचलित हो गए। उन्होंने महर्षि से कहा, “हे मुनिवर, मेरे पुत्र अभी बालक हैं, वे राक्षसों का सामना कैसे करेंगे? लेकिन विश्वामित्र, जो स्वयं एक महान तपस्वी और योद्धा थे, ने दशरथ को आश्वस्त किया। उन्होंने कहा, “राजन, श्रीराम साधारण बालक नहीं, वे स्वयं नारायण के अवतार हैं। उनकी शक्ति और सामर्थ्य से राक्षसों का संहार निश्चित है।” विश्वामित्र के दृढ़ विश्वास और तर्कों के आगे दशरथ को अपनी सहमति देनी पड़ी। यह प्रसंग भक्ति, त्याग, और कर्तव्यपरायणता का अनुपम उदाहरण है, जहां एक पिता को अपने प्रिय पुत्रों को धर्म की रक्षा के लिए वन भेजना पड़ा। महर्षि विश्वामित्र के साथ गुरुकुल पहुंचे श्रीराम और लक्ष्मण ने वहां ऋषियों के यज्ञ और धार्मिक अनुष्ठानों में बाधा डालने वाले राक्षसों का सामना किया। संतोष शरण महाराज ने इस प्रसंग को इतने जीवंत ढंग से प्रस्तुत किया कि श्रोता स्वयं को उस यज्ञशाला में खड़ा महसूस करने लगे, जहां राक्षस ताड़का, मारीच, और सुबाहु जैसे दुष्ट अपनी शक्तियों से आतंक मचा रहे थे। श्रीराम ने अपनी दिव्य शक्ति और धनुर्विद्या का प्रदर्शन करते हुए ताड़का का वध किया, जो न केवल एक राक्षसी थी, बल्कि राक्षसी प्रवृत्तियों का प्रतीक भी थी। इसके बाद मारीच को अपने बाणों से परास्त कर भगा दिया और सुबाहु का संहार किया। इस प्रसंग ने यह संदेश दिया कि धर्म की रक्षा के लिए साहस, शक्ति, और संयम का संतुलन आवश्यक है। कथावाचक ने इस दौरान श्रीराम के शांत स्वभाव, विश्वामित्र के मार्गदर्शन, और लक्ष्मण की भक्ति को विशेष रूप से उजागर किया, जिसने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। कथा के मुख्य यजमान अनिल सिंह और उनकी धर्मपत्नी ने व्यासगद्दी का विधिवत पूजन और आरती कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। संतोष शरण महाराज और उनकी टीम को अंगवस्त्रम भेंट कर सम्मानित किया गया। विद्वान पंडित उमेश शास्त्री महाराज, आशुतोष महाराज, और उनकी संगीतमय वाद्ययंत्रों की टीम ने कथा को और भी रसमय बना दिया। इस मौके पर प्रधानप्रतिनिधि सुशील सिंह,बीडीसी रजनीश सिंह निर्मल,शरद सिंह पत्रकार,  जितेंद्र सिंह जंगली, जयप्रकाश सिंह, वीरेंद्र सिंह(रामबदन) गुलाल सिंह ,अखिलेश सिंह,विजय प्रताप सिंह,राधेश्याम सिंह,कमलेश सिंह,पूर्व जिलाध्यक्ष विजय बहादुर सिंह,सौरभ सिंह अश्वनी सिंह,अनन्त सिंह , अरविंद सिंह नेता, अनिल सिंह, देवदत्त सिंह, शैलेन्द्र सिंह,अरविंद  सिंह लल्ला  निर्भय नारायण सिंह अविनाश चन्द्र सिंह,रणविजय सिंह,रविप्रकाश सिंह,विमल सिंह और शुभेंद्रू सिंह शरद सिंह पत्रकार,सहित कई अन्य लोग उपस्थित रहे।

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