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Homeअपना जौनपुरधूम धाम से मनायी गयी जन्माष्टमी

धूम धाम से मनायी गयी जन्माष्टमी

जौनपुर। जिले भी में कृष्ण जन्माष्टमी धूम धाम से मनायी गयी। इस अवसर पर विभन्नि मन्दिरों, थाना, पुलिस लाइन, दुकानो एवं मकानों में झांकी मनायी गयी और मन्दिरों पर विभिन्न प्रकार के आयोजन किये गये। पुलिस लाइन में मनमोहक झांकी देखेने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। ज्ञात हो कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हर वर्ष भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि प्रेम, भक्ति और न्याय की विजय का प्रतीक है। कृष्ण जन्माष्टमी की कथा हमें अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने, संघर्षों के बीच उम्मीद और धर्म की पुनर्स्थापना का संदेश देती है। इस वर्ष कृष्ण जन्माष्टमी 16अगस्त को मनाई जा रही है। तो इसी अवसर पर हम आपके लिए लाएं हैं। जन्माष्टमी की पावन कथा जो कि अधर्म पर धर्म की विजय और अंधकार में भी आशा और प्रेम की अटल शक्ति का प्रतीक है। पौराणिक कथा के अनुसार, द्वापर युग में मथुरा में कंस नाम का एक राजा था। कंस अपनी बहन देवकी से बहुत प्यार करता था। देवकी का विवाह वासुदेव से बड़े धूमधाम से हुआ था। एक दिन आकाश में यह भविष्यवाणी हुई कि कंस की मौत उसकी बहन की आठवीं संतान से होगी। यह सुनकर कंस बहुत डर गया। वह बहुत क्रूर था और उसने अपनी बहन देवकी और उसके पति वासुदेव को जेल में बंद कर दिया। देवकी ने विनती की कि उसकी संतान अपने मामा को कोई नुकसान नहीं पहुंचाएगी, लेकिन कंस ने उसकी नहीं सुनी। जेल में बंद रहते हुए, देवकी ने सात बार संतान को जन्म दिया, लेकिन हर बार कंस की निर्दयता ने उन सभी बच्चों को मार डाला। यह कड़वा सच देवकी और वासुदेव के लिए बेहद दर्दनाक था, पर उनका विश्वास और धैर्य अडिग था। हर बार जन्म लेने वाला बालक, जो उनके लिए जीवन की आशा था, क्रूरता से छीन लिया जाता। लेकिन जब आठवीं संतान आई, तो ईश्वर की माया ने इसे कंस के कहर से बचा लिया। उस रात, कारागार के दरवाजे अपने आप खुल गए और आस-पास का अंधकार उजाले से भर गया। वासुदेव ने इस दिव्य बालक को अपनी पत्नी देवकी के पास छोड़ने के बजाय, ब्रज के नंद बाबा के घर पहुंचाया। नंद बाबा और यशोदा मैया ने उस छोटे से कृष्ण को अपनाया और प्यार से पाला-पोसा और इस तरह, देवकी और वासुदेव ने अपने पुत्र को सुरक्षित देख अपना कर्तव्य पूरा किया।