Become a member

Get the best offers and updates relating to Liberty Case News.

― Advertisement ―

spot_img
Homeअपना जौनपुरदेवउठनी देकादशी पर महिलाओं ने किया तुलसी विवाह

देवउठनी देकादशी पर महिलाओं ने किया तुलसी विवाह

  • विधि-विधान से हुई भगवान विष्णु की अराधना

जौनपुर। हिन्दू धर्म में देवउठनी एकादशी एक विशेष दिन है, कार्तिक माह में आने वाली पूर्णिमा तिथि और भी विशेष मानी जाती है, क्योंकि इस दिन भगवान विष्णु चार महीने बाद अपनी योग निद्रा से जागते हैं। इसी वजह से इसे देवउठनी एकादशी भी कहा जाता है। एकादशी के अवसर पर श्रद्धालुओं ने विधि-विधान से तुलसी का विवाह किया। सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो घर के उस स्थान पर जहां तुलसी लगाया है, उस मंदिर में दीप प्रज्वलित कर भगवान विष्णु का गंगा जल से अभिषेक करने के बाद भगवान विष्णु को पुष्प और तुलसी दल अर्पित किया गया। प्रसाद के रूप में आंवला, सेब, केला आदि चढ़ाया गया।

मान्यता है कि देवउठनी एकादशी पर तुलसी माता को लाल रंग की चुनरी अर्पित करनी चाहिए। ऐसा करने से साधक के जीवन में धन-वैभव बना रहता है, साथ ही इस उपाय करने से शादी-विवाह में आ रही है अड़चनें भी दूर होती हैं। तुलसी विवाह का पर्व देवउठनी एकादशी रविवार को पूरे उल्लास के साथ धूमधाम से मनाया गया। गन्ने के मण्डप तले शालिग्राम-तुलसी की पूजा अर्चना के साथ विधि-विधान से विवाह हुआ। देवउठनी पर्व के बाद वैवाहिक आयोजन सहित अन्य मांगलिक अनुष्ठान पूजा की शुरुआत हो गई है। धार्मिक परंपरा के साथ तुलसी व शालिग्राम विवाह देवउठनी में कराया गया। लोगो ने अपने घरों के द्वार पर रंगोली की कलाकृति भी बनाई। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को भगवान विष्णु चार माह के लिए सो जाते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी को जगते हैं। चार माह की इस अवधि को चतुर्मास कहते हैं। देवउठनी एकादशी के दिन चतुर्मास का अंत हो जाता है और शादी-विवाह शुरू हो जाते हैं। हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का बहुत बड़ा महत्व है। हिंदी चंद्र पंचांग के अनुसार पूरे वर्ष में चौबीस एकादशी पड़ती हैं, लेकिन यदि किसी वर्ष में मलमास आता है, तो उनकी संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। इनमें से एक देव उथानी एकादशी है। देवउठनी एकादशी कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को होती है। कहा जाता है कि आषाढ़ शुक्ल एकादशी को देव-शयन हो जाता है और फिर कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन, चातुर्मास का समापन होता है, देव चौदस त्योहार शुरू होता है। इस एकादशी को देवउठनी कहा जाता है।

  • यह भी है देवउठनी एकादशी की मान्यता

पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में जालंधर नामक एक राक्षस था, वह बहुत ही शक्तिशाली था। उसे हरा पाना किसी के लिए भी संभव नहीं था। उसके शक्तिशाली होने का कारण था। उसकी पत्नी वृंदा बहुत ही पतिव्रता थी। उसके प्रभाव से जालंधर को कोई भी परास्त नहीं कर पाता था। धीरे-धीरे उसके उपद्रव के कारण देवतागण परेशान होने लगे। तब सभी देवतागण मिलकर भगवान विष्णु के पास पहुंचें और उन्हें सारी व्यथा सुनाई। इसके बाद समाधान यह निकाला गया की क्यों न वृंदा के सतीत्व को ही नष्ट कर दिया जाए। तब भगवान विष्णु ऋषि का वेश धारण कर वृंदा के पास जा पहुंचे। भगवान के साथ दो मायावी राक्षस भी थे। जिन्हें देखकर वृंदा भयभीत हो गई। ऋषि ने वृंदा के सामने दोनों को भस्म कर दिया। इसके बाद वृंदा ने अपने पति के बारे में पूछा जो कैलाश पर्वत पर भगवान शिव के साथ युद्ध कर रहा था। लेकिन वह साथ ही उसी शरीर में प्रवेश कर गए। इन सबके बारे में जब वृंदा को पता चला तो उसने क्रोध में आकर उसने भगवान विष्णु को हृदयहीन शिला होने का श्राप दे दिया, अपने भक्त के श्राप को भगवान विष्णु ने स्वीकार किया और शालिग्राम पत्थर बन गए। सृष्टि के पालनकर्ता के पत्थर बन जाने से ब्रह्मांड में असंतुलन हो गया। इसके बाद सभी देवताओं ने वृंदा से प्रार्थना की वह जल्द ही भगवान विष्णु को श्राप मुक्त कर दें। इसके बाद वृंदा ने भगवान विष्णु को तो श्राप मुक्त कर दिया लेकिन, उसने खुद आत्मदाह कर लिया। जहां वृंदा भस्म हुई वहां तुलसी का पौधा उग गया। तब भगवान विष्णु ने कहा कि वह उनके सतीत्व का आदर करते हैं, लेकिन, वह तुलसी के रूप में सदा तुम मेरे साथ रहोगी। तब से हर साल कार्तिक माह की देव एकादशी के दिन तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है।

Share Now...