Become a member

Get the best offers and updates relating to Liberty Case News.

― Advertisement ―

spot_img

आधुनिक विज्ञान प्रदर्शनी में छात्रों ने मनवाया लोहा

जौनपुर।नौपेड़वा स्थानीय बाजार में स्थित राजाराम मेमोरियल पब्लिक स्कूल पर शनिवार को आयोजित साइंस, आर्ट एंड क्राफ्ट प्रदर्शनी में छात्र-छात्राओं ने लोहा मनवाया। प्रदर्शनी...
Homeअपना जौनपुरजौनपुर की सड़कों पर कानून बेअसर : नियम तोड़ते रक्षक, खतरे में...

जौनपुर की सड़कों पर कानून बेअसर : नियम तोड़ते रक्षक, खतरे में आम जनता

रखवाले ही तोड़ रहे नियम, यातायात व्यवस्था पर उठते सवाल

जौनपुर। जौनपुर में सड़क सुरक्षा को लेकर चल रही सख्ती के बीच एक कड़वा सच सामने आ रहा है—नियम लागू कराने वाली व्यवस्था खुद सवालों के घेरे में है। हेलमेट और सीटबेल्ट को लेकर आम जनता पर चालान की बौछार होती है, लेकिन कई मौकों पर ड्यूटी पर तैनात कर्मियों द्वारा ही नियमों की अनदेखी देखी जाती है। इससे सड़क सुरक्षा अभियान की विश्वसनीयता पर सीधा असर पड़ रहा है।

सड़क सुरक्षा को लेकर सख्त अभियान चलाने वाली उत्तर प्रदेश की पुलिस की जौनपुर यातायात इकाई इन दिनों खुद सवालों के घेरे में है। आम नागरिकों को हेलमेट और सीटबेल्ट के लिए चालान काटने वाली यातायात पुलिस के कुछ कर्मियों को अक्सर खुद ही नियमों की अनदेखी करते देखा जा सकता है। इससे न केवल कानून की विश्वसनीयता पर असर पड़ता है, बल्कि जनता में गलत संदेश भी जाता है। कई बार ड्यूटी पर तैनात यातायात कर्मी खुद हेलमेट या सीटबेल्ट का उपयोग नहीं करते। जब नियम लागू कराने वाले ही उनका पालन नहीं करेंगे, तो आम जनता से सख्ती की अपेक्षा करना विरोधाभासी प्रतीत होता है। इससे लोगों में यह धारणा बनती है कि नियम केवल आम नागरिकों के लिए हैं। इसके अलावा, कई जगहों पर यातायात पुलिस द्वारा गलत स्थान पर वाहन खड़ा करना भी एक आम समस्या है। अक्सर यह देखा जाता है कि चौराहों या नो-पार्किंग जोन में पुलिस वाहनों की मौजूदगी से जाम की स्थिति पैदा हो जाती है। विडंबना यह है कि जिन स्थानों पर आम लोगों का वाहन खड़ा होने पर चालान हो जाता है, वहीं पुलिस वाहन बेझिझक खड़े दिखाई देते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यातायात व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए सबसे पहले अनुशासन की शुरुआत स्वयं पुलिस विभाग से होनी चाहिए। यदि पुलिस कर्मी खुद नियमों का सख्ती से पालन करें, तो जनता पर उसका सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। इससे कानून के प्रति सम्मान बढ़ेगा और सड़क सुरक्षा के प्रयासों को मजबूती मिलेगी। एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू व्यवहार से जुड़ा है। कुछ मामलों में यातायात पुलिस का आम जनता के प्रति असहयोगी या कठोर रवैया भी देखने को मिलता है। सड़क पर तनावपूर्ण स्थिति को संभालने के लिए संयम और संवाद कौशल बेहद जरूरी है। यदि पुलिस का व्यवहार मित्रवत और पारदर्शी हो, तो जनता भी नियमों का पालन अधिक सहजता से करती है। यातायात कर्मियों के लिए नियमित प्रशिक्षण, अनुशासन की सख्त निगरानी और आंतरिक जवाबदेही प्रणाली को मजबूत करना समय की मांग है। बॉडी कैमरा, जीपीएस मॉनिटरिंग और सार्वजनिक फीडबैक जैसी व्यवस्थाएं पारदर्शिता बढ़ा सकती हैं। हालांकि सड़क सुरक्षा एक साझा जिम्मेदारी है। पुलिस और जनता दोनों को मिलकर नियमों का पालन करना होगा। जब यातायात पुलिस खुद आदर्श प्रस्तुत करेगी, तभी समाज में नियमों के प्रति वास्तविक सम्मान पैदा होगा और सड़कें सच मायनों में सुरक्षित बन सकेंगी।

नियम लागू कराने वालों के निष्पक्षता पर सवाल ?

जौनपुर सड़क सुरक्षा और यातायात नियमों के पालन को लेकर देश के उन जिलों में शामिल है जहां पिछले कुछ वर्षों में भारी संख्या में सड़क हादसे और नियम उल्लंघन रिकॉर्ड किए गए हैं। लेकिन एक विडंबना यह है कि नियम लागू कराने वालों की ही निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते रहे हैं। जब नियम लागू कराने वाले भी इन पहलुओं को कभी-कभी गंभीरता से नहीं लेते, तो नागरिकों में एक धारणा बनती है कि  ‘सख्ती केवल चालान काटने के लिए है, सुरक्षा के लिए नहीं। नियम सिर्फ चालान काटने के औज़ार नहीं हैं — वे जन जीवन बचाने के सिद्धांत हैं। तभी जब खुद नियम लागू करने वाले प्रथम उदाहरण पेश करेंगे, तभी सड़कें सुरक्षित बन सकेंगी।

पिछले 5 वर्षों में कुल 1810 मौतें

जनपद में 2021 से 31 दिसंबर 2025 तक 1161 स्थानों पर 1810 लोगों की मौत सड़क दुर्घटनाओं में दर्ज की गई, और 23 स्थानों को ब्लैक स्पॉट घोषित किया गया है। इन हादसों में लगभग 90′ मौतें हाईवे पर ओवरस्पीड और नियमों के उल्लंघन जैसे हेलमेट/सीटबेल्ट न पहनने के कारण हुई हैं।

युवाओं की बड़ी हानि

एक स्थानीय सर्वे में यह उजागर हुआ कि हादसों में मृतकों में 50′ से अधिक युवा चालक और यात्री हैं, और इसके पीछे एक बड़ी वजह हेलमेट या सीटबेल्ट का न पहनना है, जो लगभग 70′ मामलों में देखा गया।

जागरूकता अभियान और सख्ती की मिली-जुली कोशिशें

कई कार्यक्रमों में स्कूल बच्चों को नियमों की जानकारी दी गई, हेलमेट वितरण अभियान चलाए गए। लेकिन वास्तविक सड़क व्यवहार में नियम उल्लंघन की संख्या कम होने की बजाय बनी हुई है।

जमीनी हकीकत: नियम सिर्फ जनता के लिए?

शहर के प्रमुख चौराहों पर अक्सर यह दृश्य देखने को मिलता है कि ड्यूटी पर तैनात कुछ कर्मी बिना हेलमेट बाइक चलाते दिखते हैं। पुलिस वाहन नो-पार्किंग जोन में खड़े मिलते हैं। यातायात नियंत्रण के दौरान मोबाइल फोन में व्यस्तता देखी जाती है। ऐसे दृश्य आम नागरिकों में यह संदेश देते हैं कि नियमों का पालन चुनिंदा रूप से लागू किया जा रहा है।

पुलिस लिखी बाइक पर टाइट होता है भौकाल

सड़कों पर अक्सर ऐसी बाइक दिखाई देती हैं जिन पर बड़े-बड़े अक्षरों में  ‘पुलिसÓ लिखा होता है। यह शब्द सिर्फ चार अक्षरों का है, लेकिन इसका असर कई बार ट्रैफिक सिग्नल से भी ज्यादा तेज़ होता है। जैसे ही लोग  ‘पुलिसÓ लिखा देखते हैं, उनकी चाल-ढाल और रफ्तार अपने आप संयमित हो जाती है। दरअसल, यह भौकाल केवल शब्द का नहीं, बल्कि उस जिम्मेदारी और अधिकार का प्रतीक है जो पुलिस वर्दी के साथ जुड़ा होता है। समाज में कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी पुलिस पर होती है, सड़क पर खड़ी या चलती ऐसी बाइक आम लोगों को सतर्क कर देती है कि नियमों का पालन जरूरी है। लेकिन कानून के यही रक्षक कानून को खुद पर लागू कराने में भौकाल में कमी समझते हैं। आम तौर पर सभी वाहनों पर नंबर प्लेट भारत सरकार द्वारा जारी किये गये प्लेट ही लागू हैं, लेकिन जब गाड़ी पर पुलिस लिखा हो तो यह नियम भी बेबस साबित होता है।

Share Now...